Nov 30, 2012

दोस्तों के बारे में....



मियाँ  छोटे  जनमते  हैं,  कई अल्ताफ़  होते हैं
सुबह  की  सरहदों में, फुदकते  अल्फाज़ होते  हैं
उन्हें मालूम क्या, होना न  होना, है न आगे क्या
सफ़र रोचक नहीं होता, न  जिस में, राज़ होते  हैं

खुले  आँगन के पट्ठे,  काफिलों  में  चहचहाते  हैं
होश  में जोश  में  कट्ठे,  कायदे  काज़ होते  हैं
वक्त से  इल्म की बीमारियाँ, फलती हैं आँखों में
करों के जोड़ मन गुइयाँ,  प्रश्न  जंगबाज़ होते  हैं  

खुले  बढ़ते  हैं लंबे  बाल,   सूरते-हाल, चालों  पर
खड़े  गतिबोध, और प्रतिरोध,  नक्शेबाज  होते हैं
सफ़ों  से  फूंकता है मन,  मनन में आंच सरगर्मी
दिखे उखड़े,  जहां  बिखरे,  सखत  आगाज़  होते हैं 

तरंगें  सर  उठाती है,  रगों में  बिजलियाँ बन कर
फेन  आदर्श  सड़कों  पर, बदल के साज़  होते  हैं
नहीं  रुकते  सभी  सुर एक, ढलते  हैं  लकीरों में
फकीरों  से, शहर  भटके,  अमल  परवाज़  होते हैं 

कभी  के  मोड़  ज़ाहिर,  आसमानों  के  गिरेबाँ पर
जहाँ  पर  फाख्ता के  साथ,   उड़ते   बाज़ होते हैं
समय संजोग,  जिम्मेदारियां,  पकड़ा   ही  देते  हैं  
उसी  से  छूटते, कुछ  जो,  गुज़र के  नाज़  होते हैं

ये  पूरा  खुश  कोई,  रहता किताबों में,  कहां वो भी
हिसाबों  में  मयस्सर,  जिस  को तख्तो-ताज़ होते हैं
कई  दिलचस्प  क़दमों से, तिलिस्मों  की  ज़मीनों में
जिसिम ज़िंदा वो कैसे,  किस किसिम, जांबाज़ होते हैं

वो  रोज़ाना में  लिपटे हों, तो  कपड़ों  में  नहीं जाना   
किसी  सलवट  के अंदर,  नम ज़मीं  के राज़ होते हैं
वो ऐसे थे नहीं,  ना वो  रहेंगे,  इस तरह,  हर  दम
धनुक के  रंग  भर कर,  दोस्त  जो,  अंदाज़  होते हैं

वो  लड़ियाते  हैं,  लड़ते हैं,  वजह  से  ठोकते हैं जो  
अब  आखिर दोस्त हैं,  बेबात  भी,  नाराज़  होते  हैं  
चलो  बतला  दें, उनको  दूर रह  कर,  दूर भी न  हों
उन्हीं  का  हौसला,   वो  नूर  की,  आवाज़  होते  हैं

Sep 30, 2012

पूरा नहीं उदास

 ....

ये  जो  धूप-छाँह  कयास है
और  न  डूबने का प्रयास है

जैसी  आस-पास धमक-चमक
वैसी   आस  मन के पास है

चंद  गुल मोहर  की बाज़ियाँ
बंद  पत्तों का अमल तास है 

सब  रेत  रेत  दयार  भर
बस  रहे के  नाम प्यास है

चार गमले बसा के छज्जों में
सब्ज़ आदिम खुशी  बनास है

कब  गुज़र गई मीठी  छनी
कब  बदल  बनी  खटास है

अब  जो भी है बड़ा सा है
या  विष है या  विश्वास है

यों  गज़ल  नुमा मरीचिका 
छंद  भाग बन का वास है

चलो  टूटते  तारे  से  ही
इस  रात  की  उजास  है


Aug 31, 2012

मिर्च की बातें



बात का मानें बुरा  क्या, बात होती जाएगी
बहस फंसती सुबह, कारी रात होती जाएगी

रुसना  रूसे  मनाना,  रोज़ रुकती  रेल  है
फ़िक्र के चक्के छुड़ाना,  चल पड़े फिर खेल है
मैदान से ना भागिए, ये आप की ही बात थी
जीत हारें दुःख चले,  बचता मनों का मेल है

कुछ दिनों में यह गई, बारात होती जाएगी
बात का मानें बुरा क्या, बात होती जाएगी

ये हम पढ़े वो तुम पढ़े, सुनने कहे का माल ये
नाली में थोड़ी जाएगा, संचित क्षुधा का थाल ये
इस भोग का परशाद तो, मीठा कभी खट्टा कहीं
कुछ मिर्च भी मिलवाइए, अपना बने वाचाल ये   

बे-तीत के बीते में फीकी, याद होती जाएगी
बात का  मानें बुरा क्या, बात होती जाएगी

यह लाज़मी  कैसे है, केवल आपकी  ही सब सुने
ये तुम सुनो वो हम सुने, बकताल  के बक्से भरें
ऐसा  खजाना हो महाशय, राज तक को रश्क हो
दौलत  दिलों की जोत, भूलें  रात के  झगड़े बड़े

धौं देखिये दीपक ये जो, सौगात होती जाएगी
बात  का  मानें बुरा क्या, बात होती जाएगी

अब सब  अगर हो जाएँ, अपने आप से, अटपट अजब
कुछ नया  कैसे हो, अगर,  बस एक सा हो सब सबब
बेहतर  है  थोड़ा  दर्द  लो,  दिलफोड़ बातें  भींच कर
सर्वांग आकुल विकल हों, ज्यों जब अलग की हो तलब


सबके अलग को सींच कर, ऋतु साथ होती जाएगी
बात  का  मानें  बुरा  क्या,  बात  होती  जाएगी

चूंकी  धरा   अलबेल  है,  सच के कई अपवाद हैं  
कितने  मिलेंगे  जहां  ऊपर,  कर्कटों  की खाद हैं
उनका कहा सुनना गया इस कान से उस कान तक
आगे चलो  प्रिय  प्रेम से, कविता भरे सब स्वाद हैं

तुक काफ़िये महफ़िल,  कहे आबाद होती जाएगी  
बात  का  मानें  बुरा  क्या, बात  होती जाएगी


Aug 19, 2012

काव्यशेष आकाश



गूढ़ अंतर से मिला कर मूढ़ मंतर
तर बतर लौंदा चढ़ाया चाक पर
भर हाथ माटी मन लगाया
सजल खांटी तन बिठाया थपथपाया
धिन्नी चकर गोला घुमाया
वर्तुलों की धाक धर
तब कर धड़ा गहरा घड़ा

गहरा धड़ा पानी चला कितना घना
छल छलक छल चिकना बना इतना छना 
छनकर छनन झंकार टप्पे ताल
ढुलका  ढुलक ढल तलवार या की ढाल
लोहित रूप ढाली अवसरों की खाल
जंगी आंच झुलसा रे मना
मन रंग तापे तब चढ़ा गहरा घड़ा

गहरा चढ़ा घटता घटक संयम झटकता जा रहा
डर के परे वो सब करे वर्जित सुना जो था कहा  
बोलें न बोलें महफ़िलें
पुरखे कथन की अटकलें
टक राह रोकें खट चलें
चलता विकल अनुवाद धीरज जा बहा  
अनुराग बस घर्षण गड़ा गहरा घड़ा  

गहरा गड़ा पाताल नभ का भाल
धरती की भुजाएं समय के चर व्याल  
कूट विलोम धर के धार
आगत नियति का व्यवहार 
सादर ना रहा हर एक जैसे बार
सब दब बुदबुदा घिसता गया अवशेष में वाचाल
अटपट अगिन का  भूचाल जिस जग में पड़ा गहरा घड़ा

गहरा पड़ा लो गूँज खोती जा रही लो गूंज
की आवाज़ भी ना आ रही अनुगूँज
किसने कब सुनी सूनी डगरिया भीड़ के
रेवड़ बड़े झूले झुलाती रीढ़ के
अंगवाल ले चुप्पी छुपी बहरी नगरिया नीड़ के
तिनके उड़े उड़ते गए तो मूंज
के रस्से कटा बादल उड़ा पोला खड़ा गहरा घड़ा

Aug 13, 2012

बेचैनियाँ



आरे आज के चिरते, गुज़ारे कल नहीं जाते
जले रस्से तमाशों में, हमारे बल नहीं जाते

ये चिपकी राख है बेढब, जो उड़ने भी नहीं पाती
हवा में दम भी ना इतना, शरारे जल नहीं जाते

तपिश ले जा रही कितने, समंदर लहर पारों से
नदिया क्या कहूँ तुमसे, ये खारे गल नहीं जाते

तेरी मिट्टी का साया हूँ, वो सौंधी है मेरी नस में
दश्त दम तेज सूरज हो, तेरे बादल नहीं जाते 

बड़ी मायूस गलियां हैं, कोई किस्से नहीं सुनता
फ़साने अजनबी के राज़, प्यारे छल नहीं जाते 

ये सब टलते हुए अंजाम, सुबहो शाम कहते है
सवालों को सम्हालो गर, संवारे हल नहीं जाते 

न मैं हूँ वो न वो तुम हो, ये हम जैसे यहाँ बदले
काश रुखसत की घड़ियों से, उजाड़े पल नहीं जाते 

Aug 7, 2012

हंसध्वनि



[ उर्फ़ मोह-दृष्टि द्रोह-दृष्टि बब्बन उवाच ]

....राजहंस की खबर सुनी है आने वाला है

श्वेत धवल है, कहते हैं वो, कहीं छींट की स्याही उस पर, नहीं ठहरती
इतना उजला, चपला शायद, वही पंख ले, धरा उतरती
रोज़ नहीं आता डब्बों में भरे खचाखच लगे धकाधक
टेढ़ी मेढ़ी रेल पेल से कितना ऊपर उड़े चकाचक
उनका जैसा नहीं, रंग के, बैठ गए जो इस जहान में
असली खालिस, शुद्ध बना है, मिस्टर वो तो आसमान से
बादल संग सुकून सुधा बरसाने वाला है
कलुष मनुज कहते है वो धुलवाने वाला है

इतनी सारी उम्मीदें आशाएं उसके आने पहले यहाँ हो गईं
अनदेखों में बदल की बातें उंगली बित्ते जमा हो रहीं
दृढ विश्वास भरा है उन्नत ग्रीवा उसकी असली है
उसके आने के भय से मोरों की हालत पतली है
भीड़ नहीं भगदड़ से फैले, जाते किस्से नीर क्षीर के
वो आएगा ठीक करेगा, सब मुरीद हैं नए पीर के
देखा भाला नहीं मगर बतलाने वाला है 
नल के से वरदानों को घर लाने वाला है

इसी लिए बेदाग़ मानते, शायद, दिखता नहीं दूर से
और पास आने पर, जायज़, चुंधिया जाएं नयन पूर ये
तब देखेंगे, डैने कितने, खर पतवार कटाएंगे
कितने सपने, सच होंगे, या फच से फट हो जाएंगे
क्या किसान की बात सुनेगा, या कुम्हार की सोचेगा
या फिर पंख सजाने को, बाकी की बाड़ी नोचेगा
मोती चुगना उड़नखोर क्या खाने वाला है
उतरेगा नीचे या बस मंडराने वाला है

बब्बन सम्मत नहीं विषय से अलग थलग से रहते हैं
फटी हुई तहमद से अपना मुंहय पोंछते कहते हैं
तुलसी बाबा कहे रहे वा चेरि छांड़ि के बात
उहय मिली हर आज़ादी माँ, उहय सांझ दिन रात  
बाकी-झांकी फाका-मस्ती सावधान-विश्राम
फांकी चीनी काम नाम की सो मीठा परिणाम
मेहनत करने वाला चख कुछ पाने वाला है
उड़ने वाला चुगते ही छक जाने वाला है

इतने सारे परमहंस देखे जो आए बटोर गए
और हाशिए पर जमघट में हाजिर कितने नए नए
कोई काटे जात नाम, मज़हब पर कोई बाँट करे
कोई आधी अकल लगाए, कानूनन गुमराह करे   
सभी लड़ें पैसों के बल पर, जिन्हें लूट ने लेना है
जिसका जिसने लिया उसी को, सूद बाँध कर देना है
जब चांदी जितवाय, न्याय मर जाने वाला है
नियम नया क़ानून, कसम घबराने वाला है

हंस हवा में रहा तभी, सब कहते हैं, कस अच्छा है
तनिक भुईं में आय, कहेंगे, चिड़िया का ही बच्चा है
ये बब्बन की बात रही, है नहीं जरूरी, आप सुनें
आँखें खोले, जांच देख कर, अपनी मर्जी छाप चुनें
किसने देखा चमत्कार, सरकार भूल का जंगल है
सभी वाद कुछ खोट भरे, हर शुभ में थोडा मंगल है
ऐसा क्या कम चोर ही कम हरजाने वाला है
हर्ज़ नहीं कुछ नया बने जो आने वाला है

वैसे दुनिया भर का, जैसा, हाल बताने वाला है
बड़े खड़े जो देश, वहाँ भी, चकमक घोर घोटाला है  
सभी समंदर नमक भरे, खारों का खर तर जाला है 
बनने वाले बहुत जहां पर, तेज बनाने वाला है
मन है जब तक चाह, दर्द रह जाने वाला है
सा रे ग प नि सा जैसा, गाने वाला है  
अभी दो पहर ताली दो वो आने वाला है
अपना तम अपने भ्रम से बन जाने वाला है

...और राजहंस की खबर सुनी है आने वाला है ....

Jul 27, 2012

अधूरे रहे आने की किताबें


नींद का नींद में लिखना, निनलका मनगढ़न्त
और फूट जाना गुब्बारों का एक के बाद एक आँख के खुले तुरंत
फिर वही सब काम, सब पुर्जा-पुर्जा तुरत-फुरत यन्त्र
किया कितना, दिया कितना, जिया कितना, लिया कितना, रोज़मर्रा यथागत अत्यंत
आद्योपांत, बस जोड़ दौड़ का धुंधलका, बस घट मन की बागी डोर,
ओसार में अटकी बातें, अनागत, बनतीं बाती, कहीं ठोंके कील कठोर
स्वर खोजता अधूरा  हलंत, पर्यंत भुलइयां गंतव्य का पता ठौर
और नाम-भूले बतौर, याद हैं कितनी अधूरी, अधूरे रहे आने की किताबें अभी और

और रहे कितने तारे, गिनने को खुले आकाश घना वट अनंत ऊपर
कूचियाँ-सूचियाँ या कर पढ़ने के किस्से, भरे बक्से अटारी अंतरजाल दिक्-देशांतर
शहर समझने की भाषाएँ, आशाएं, खाते कानून, नियम और अधिनियम,
दुःख-सुख कारण निवारण, दवा बीमारियाँ गांठें, इन्कलाब, बने-बिगड़े तद्भव-तत्सम
गरम नरम फूल-कांटे, चिड़ियाँ चिट्ठियाँ बाँटें, ज़िंदाबाद, इतर-बितर, वसुधैव कुटुम्बकम्
नाम अनाम समानार्थी कितने साथी, पनाहों की बदलती छांह, कितने नए दौर
बांटने का समय छाटें कैसे, गिने कितने ऐसे, दुखते उंगली के पोर पोर  
और काम-साए शोर, लिखनी हैं कितनी अधूरी, अधूरे रहे आने की किताबें अभी और

और बिखरा समय जो आयु की आय में, जीवन का व्यय यहीं कहीं
यही है जो है चलायमान, कदम, मान, अनुमान, खाता बही
रही आस कभी मुमकिन शुदा तय, सब कुछ में कुछ हो पाने का विनय अनुनय
जैसे एक दिन शायद, पधारें जगद्गुरु विशारद, हों एकद विविध विषय
अव्यय पर लगातार, मेधा की रेखा के पार, लगी लीकों में बेहद विमूढ़ वलय
अनय क्षुधा के अंतराल, बहरहाल, पूरा होता नहीं, दुखद अन्वय भी पुर जोर
होता नहीं जो पढ़ने को, कहने को, लिखने को, रिसता है बन किरन, जाती भोर
और बची शाम चोर, खोनी हैं कितनी अधूरी, अधूरे रहे आने की किताबें अभी और

और अधूरे हम सफर पूरा लुभाता, तृष्ण मृग त्रिज्या बंधा क्या हाथ में लाता
साथ बहता पसीना ऊब आता,  पुन फुटकने रंग धब्बे छोड़ के जाता
विधाता एक दिन भी और बाकी हो ये जीवन में, तो दुनिया भर में कितने साल आने हैं
गए की छूट के आधे, मुसलसल भाग से आते हुए औरों के खाने हैं
रहें गुलज़ार, कई हज़ार, चमचम या कटीले, हरे-पीले उगते जाने हैं
कहें जो सुलझा सुलभ पाया है धरा, बाकी रही उलझन यहीं, है क्षितिज छत के छोर
कहाँ पूरा, कभी आकाश देखा या कहो नाचा, कहाँ से कहाँ मन का मोर
और जंगल में किशोर, फूलेंगी अभी कितनी अधूरी, अधूरे रहे आने की किताबें अभी और.

Jul 20, 2012

लापता मसरूफ़

(१)
कड़ियाँ ये जोड़-जोड़ के सांकल बना लिए
फिर इर्द- गिर्द द्वार दर ताले लगा लिए

लहरों से ज़रा खौफ़ उफ़नने का जब लगा
झट तट हवा  को रोकने वाले लगा लिए

रुकती सदा में गंध महक थी खिलाफ़ की
तब  आस पास नींद  के जाले लगा लिए

नीदों की राहतें अमल सपनों की आदतें
कुछ धुंए और थोड़े से ये प्याले लगा लिए

तुम भी बने रहना मियाँ ऐसे मिजाज़ में
इस बात पर  टीके  कई  काले लगा लिए

जैसे उठे, दुनिया बदल को देख लेंगे तब
फ़िलहाल यूं मसरूफ़ हवाले लगा लिए

(२)

ना-मालूम रदीफ़ ना-फ़िक्र काफ़िया है
हिसाबों में रोगन, यूँ  ही भर  लिया है

यूं रंगों की रफ़्तार कातिल है जानिब
बखत ने जो करियन सुफैदा किया है

हमारी  न  मानो  ये  सारी  की  सारी
रोज़  रोज़  थोड़ी  बदलती  दुनिया है

दुनिया के बारे में फ़ाज़िल  ही  जानें
अपना सफ़र सबने खुद ही जिया है

इतनी  मोहब्बत  से  बांटी  नसीहत
साहिब समझते  फसक का दिया है

Jun 19, 2011

जि.. जी.. विषा

[.......]

जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है.

बलाएं भी बिरादर इस तरह, संग राह है प्यारे,
पनाहों में पता चलता, कहर पहले से आए हैं.

उन्हें रातों के बारे में, खुदा मालूम कुछ ना हो,
जिन्हें लगती मुसीबत है, वो कैसे दिन बिताए हैं.

अभी दिखता नहीं नासूर, काँटा है हिजाबों में,
गए वो अक्स अक्सर, आईनों में चिरमिराए हैं.

इन्हीं हालात से, नाज़ुक बने हैं हाल इस माफिक,
कहीं छोटे से छोटे शब्द, बढ़ कर दिल चुभाए हैं

बुरा ना मानना, उनको लगेगा वक़्त चलने में,
जो पिछले पाँव छालों के, चकत्ते काट लाए हैं.

वो वैसे हों न हों, जीवन उन्हें गुलज़ार रख लेगा,
यही दुनिया है, ज़िम्मेवारियां बरगद के साए हैं.

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

Jun 10, 2011

लयकतरा

[.......]
आदत बहले, मत बदले, हौले हौले सहलाने वाले,
चंद मंद रंगवाने वाले, गीत लौट कर जाने वाले.

सूना मान मिला कर जूना,
सावन घर में छप्पर चूना,
बदर बदरिया बरस बुरादा,
खोखर भरे काठ में दूना.

बिन बारिश का भरा समन्दर,
पथरीला तट बाहर अंदर,
बहुरि भरें मरू का गोवर्धन,
उंगली हाथ नचाने वाले .

मूसल का आधार बना कर, कूट पिसान पिसाने वाले,
बन घन सुर में आएं गाएं, असली के बरसाने वाले.

मन क्या करता नहीं तुम्हारा,
पुलक पुराना मिले दुबारा,
झलक दिखाकर ओझल होता,
पलक झपकते ख्वाब इशारा.

तन्मयता का नशा खुमारी,
रहा रहेगा, बात लबारी,
सुनते स्वर में रही गनीमत,
निशमन नयन निभाने वाले.

झंकारों में ताल ठोंक कर, तार बिरंगे ताने वाले,
निंदिया से कुछ ले भी आएं, सपन सुनहरे बाने वाले.

मुक्त युक्त की बेधुन लय है,
गुप्त लहर बंधन संशय है,
अमिय कहो उच्श्रृंखल हाला,
तृप्ति विजन ऊबड़ आलय है.

कहते कहते रह जाने में,
याद मंत्र के सह धाने में,
पुर का पहना कहाँ उतारें,
गाम धाम मन माने वाले.

बुद-बुद फूट पड़े आते हैं, भाव पुराने भाने वाले,
छुट्टे छंद बंद होठों को, सदा नहीं सिलवाने वाले.

कथा नाम के पद्य अबाधा,
जिनका होना सीधा साधा,
वज्र कठिन साधन संधाना,
यथा विधा को पाना आधा.

इतनी सारी आवृतियां जो,
कृतियों में कृतियाँ उठतीं गो,
क्लिष्ट कला की बूझ समझ में,
छाया मृग पकड़ाने वाले.

धर प्रयोग की पकड़ जकड़ में, अपने राम पुराने वाले,
जैसे घड़ा भरे जिस दिन, उस जल की धार बहाने वाले.

[पु. – वैसे अपने राम के बारे में ये भी कह सकते हैं कि – “भगवा सगवा नहीं पहनते, मर्यादा रह जाने वाले” -मिर्च ज्यादा हो जाती है ]

May 28, 2011

पलायन वा आगमन वा

फ़र्ज़ कर लो कि इक दिन सुबह ना उठे,
नीम अंगड़ाइयों पर बिखर कर बिछे,
नीले मलमल का हौदा लगा कर मगन,
बस रहा हो मधुर छींट का कारवां.
फ़र्ज़ कर लो कि दुनिया बनी ही नहीं.

फ़र्ज़ कर लो समय को खबर तक न हो,
चुप रहें बत्तियाँ चुभ सुई हे अहो,
हल्के पल की ज़मीं लाख लौ के गगन,
मोमजामा पनाहों में पिघला धुंआ.
फ़र्ज़ कर लो शुरू से है पगली नदी.

फ़र्ज़ कर लो बरफ़ है छनी रेत से,
घुप सुरंगों में सूरज की डिबिया कहे,
ऐसा कुछ भी नहीं जो हुआ दफ़्अतन,
छू उड़न की दरी पास की दूरियां,
फ़र्ज़ कर लो गहर में सफर की मणी.

फ़र्ज़ कर लो खुरचता हुआ मूंज का,
नाम रस्सा गिरह खोल भागा हुआ,
मेध से दूर छिटका हुआ हय बदन,
हांफता भांपता कांपता काफ़िया,
फ़र्ज़ कर लो तमन्ना की बाज़ी गई.

फ़र्ज़ करलो गया जो सदा साथ है,
सम सा अन्दर की लहरों में अहसास द्वय,
ज्वार भाटा न दहके महक रात दिन,
उसका रहना सिफर भाल की जालियाँ.
फ़र्ज़ कर लो कथाओं में बचले हँसी.

फ़र्ज़ करलो ये सब रोज़ की मुश्किलें,
काट खाएं नहीं, आती जाती रहें,
जाते आते रहे कल गया बालपन,
लू थपेड़े सुदृढ़ में मिलें आंधियाँ.
फ़र्ज़ कर लो रहा कुछ सही आदमी.

फ़र्ज़ कर लो कि ता ज़िन्दगी भीड़ में,
जो घुमाकर मिले, वो मिलाकर घुले,
थोड़ा कड़वा भी हो प्रेम का हो चयन,
मध्य मीठा रहे अंततः साथिया.
फ़र्ज़ कर लो ये ना हम से है जो सभी.

फ़र्ज़ कर लो यूंही बात कहने में जी
फ़र्ज़ कर लो यूंही बात रहने में थी
फ़र्ज़ कर लो यही बात आने में सी
फ़र्ज़ कर लो ये आने के जाने में भी....

May 18, 2011

चुहलकदमी

खिदमतगार,
ज्यों गए हों कभी, राष्ट्रीय राजमार्ग से जनपद रीवा तहसील हुजूर विन्ध्य का पुराना पड़ाव,
बरास्ता मिर्जापुर डिरामनगंज पार हनुमना से देवतलाव
क़स्बा मनगवां तक, गड्ढे पर खड्डे धौं पिचक, चढ़ेंगी उतार पर हड्डियां पारों में चढ़ाव,
पड़ेगा पंजर के हिलने और पंचर के मिलने का पूरा दबाव.
बड़ेखां परमसंतोषी खड़बड़िया, आप भी बड़बड़ाएं अपने से ही सुभाव
हिन्दुस्तान के दिल में काहे भला है भली राहों का अभाव.
लगातार.

चलबहार सड़कें बनें, चाहते हैं चलित चलनेवाले राहगीर,
सहनेवाले सहित उम्मीद में हैं, पहुंचें राहें कराह-रहित उनतक देर सबेर,
रहनेवालों के मन में भी रही है फलित आशा की टेर, यहाँ तक
रहजन भी चाहते हैं कथित डगर, निकले अगर, सूने इलाकों के व्यथित कगारों में
बढोत्तरी की हवा चले, तथित समर्थ बटमारों में,
सखा सहमति में हैं और सरकते तंत्र में कई एक तंत्री,
कार्यपालक यंत्री, ग्रामसेवक, नगरसेठ, पार्षद और मंत्री,
और तो और, कुछ ऐसा दोपहिया प्रेमी भी चाहते हैं, सुरभित एकांत कभी कभार,
घिरी हरियाली में हो मधुर मार्ग अकेला बस हम-तुम इलाका रहे सन्नाटा बढ़िया,
और कभी कभार अचानक गढ़हे सिर्फ दो-इंची दो चार,
जहां से उचक जाए हवा खाती फटफटिया का पहिया.
चिपक के चक्कर की हवा न लगे, उन्हें
जो हों नात-बाप, या खाप के पंचायती बुज़ुर्गवार,
फतवों में जिन्हें भी है आने वाली सडकों का इन्तज़ार.
सहृदय प्रदेश में लेकिन होता नहीं ऐसा चमत्कार
इतने बहुल संकुल आशाभाव के बावजूद पथ रहे दुर्गम, यात्राओं में न आराम न करार.

खुशगवार प्रेम.. आह.. प्रेम.. इस सड़कछाप कवितानुमा में इश्क का ख़ुफ़िया ज्ञापन,
अमुक के आवाहन के लिए विद्रूप का ललमुनिया विज्ञापन,
व्यावहारिक समकाल सा खटका है इस गुहार,
तनिक सबर, खम्मा घणी, इस पन्ने के पढ़नवार,
पथराव पर सड़क घुमा कर बात है तड़प, इस खुमार बे-नग्मा बे-निगार.

शहरयार ये अजबतुक चुहलकदमी चिरकुटा पदचाप,
प्रेमाश्रित नहीं है केंद्रित है सडकों पर, हालांकि जनम जानें हम-आप
सड़कें और भरी सड़कों में नयनांकित व्यवहार,
प्रेमाभिव्यक्ति का एक खास पसंदीदा उपकरण है,
गुनी कहते हैं सड़कों का अभिकरण, प्रणय की प्रगति में अगम ठगम चरण है
कोशिश में हम निर्गुन नादीदा लौट कर ई सड़कों पर आ से जाते हैं माईबाप,
जहां कुछ प्रेम भी आलोचना और नई सोचना के साथ फूले-फले बिन जाप,
रोज़ाना की आराधना तो चलती रहेगी किसी प्रकार बेनाप,
और पुण्य के पाप जैसी अक्सर ज़िंदगी में लकीरें होती जाएँगी एक से दो से चार
चित्र खींचते रहेंगे तस्वीरों में दिखता रहेगा मित्र मन प्रकार,
बेमौसम यदा कदा कुछ ऐसी भी फुहार, जिसका कोई सटीक मतलब न हो
लगे उम्दा सा कायदा मगर तलब से हो तालिब की बेगार.
उस्तादी भी एक छलावा है, शागिर्दी समझ में तजुर्बा बरकरार,
अरे हाँ, ये गनीमत वो नहीं बने चेले महाआस्तिक तालिबान के आधुनिक अवतार.
लो सहयात्री हम फिर भटक गए, शिकायत की सड़कों से इस बार

रोज़गार जैसे नहीं बनती सड़कें सटक बनवाते हैं ठेकेदार,
जैसे असलजात रोड़ीदार सड़क के मामलात समझे हैं बौड़म के प्रेम प्रकार,
जैसे कोलतार जो था नहीं दाड़िम मुखर, रहा अमूर्त निराकार,
पर पास हुआ था सड़क के बिल सम्प्रति लठमार,
प्रशासनिक सन्दर्भ में तनिक अवैतनिक ज़्यादा,
नरेगा नहाई बहेगा बंटाई धर्मानुसार ऊपर नीचे बाकायदा,
सफ़ाई से धर्म जिस अनुसार है बँटवार,
सो रहे पुख्ता जनतांत्रिक प्रणाली में जनाधार,
समाजसेवा जमावन के गल्प में साभार,
ये भी एक कारण है सड़कें गज में नहीं कागज़ में हैं ठोस नमूदार,
देखिये अब प्रेम के साथ प्रशासन आलोचन भी खिसक आया इस भ्रष्टाक्षर व्यवहार.
क्या करें, गरियाना सबसे सरल है उसको जो है नहीं, या सुनता नहीं बड़ा सार्वभौम आकार
मूसलाधार हिदायतें मुखमार्जन की सरल परिणिति हैं, सलाह आसान बस करना है दुश्वार
वैसे भी कहें सहस्त्रबाहुओं में हमेशा से होते हैं उद्घोषण और शोषण के जीवंत हथियार

योजनाकार सड़कें एक ही कारण नहीं है जो न हो तो न हो दरियादिल चुनावों का बुनाव,
आम बात है हुकुम हुक्मरानों को चाहिए सियासत में रियासत का स्वभाव,
रईसी जिसकी सलाइयों में रिहाइश है कानूनी नोकदार,
ऐसी चुभती खिचड़ियों से हुकूमत का दस्तरखान है कारोबार,
रही बात सडकों की राहें तो बिगड़ती हैं भादों सावन,
उन्हें चाहिए और से और काली परतों का जमावन, आए अगहन पार कुआर,
परत के ऊपर परत एक और परत दर परत डर परत
टूट फूट लाम लूट तह सतह कुछ सुख कुछ असह अबूझमाड़ अनवरत
हर परत पूछती है दूसरी से बता री परत
और कहाँ तक चलेगा सीने से चक्कों को गुज़रना आर-पार,
या हम भी टूट जाएंगे भरभराकर किसी सफर के तहत
लिखा बचत मनगिनत
यात्राओं में ही जमा रहेगा हम परतों के उधेड़ते रहने का मनसार,
परतों की परी कथा, गर्दों की तथा व्यथा,
राह बदर फिर एक बार, हमारी कहास को ले उड़ी दुःख दबी भड़ास इस बार सरकार,

सूत्रधार हमें खेद है वट वृत्तांत में चुस्त थकावट के लिए,
सुस्त झगड़ते जीवट में सुखान्त की आहट, उसकी बनावट के लिए
सखेद हम सिर्फ खुदी सड़कों से खोद कर निकालना चाहते थे, एकमुश्त प्रेम और संतोष
और सपाट सीधी सड़कों से लौटना चाहते थे घर, दोपुश्त जहां गहा था विस्मृत स्मृति कोश
मध्य के उस विविध विशाल ऊंघते प्रदेश,
सरई सागौन महुआ तेंदू गुलाबी चना और हिन्दीमना के बचे खुचे पलाश परिवेश,
शेष है शायद निहित अनिमेष,
जहां भाषा से वसुधा, आशा से प्रेमसुधा, संघर्ष से काननअंगार और पहल से ललकार
अगस्त्य के इन्तज़ार में ठहरा विन्ध्याचल पठार
लेकिन जहां सड़कें बिलकुल भी नहीं बनती है किसी भी भली प्रकार
और कलाओं के किलकते अरण्य से निर्यात और विस्थापित होते रहे हैं फनकार
देश पार की चांदी चमचमाती रेत में खाली सरपट राहों के चलाव में
या फिर गोरेगांव या गुडगाँव की भीड़ भरी सड़कों के गजबज ठहराव में
गोपनीय ऊब का कलरव शोर के ऊपर धीरे से डालता है दबाव
हमारे अंदर सहसा जाग जाता है बेमतलब आरोह अवरोह लौटने का चाव
नहीं मिलने के गाँव
..रास्ता मिर्जापुर डिरामनगंज पार हनुमना से देवतलाव..





Apr 28, 2011

संगत राशि


पक्का नहीं कहता  कि सब, सांसत से लड़ लड़ता हूँ मैं
हम कदम इक दम  मिला, दुइ  पाँव  चल चलता हूँ मैं

उजड़ें   दीवारें  खँडहर,  छातें  हों   ख्वाहिश  बरस  भर
आसमां  तू  उड़  भी  जा, पर-छाँव  चिन  चिनता हूँ  मैं

कुछ  व्यर्थ हों,  कुछ  अर्थ हों,  जेवर  जवाहर  जर नहीं
दो  कौड़ियों  के  एकवचन, बहु  दांव  धर  धरता  हूँ मैं

तन-धन  छंटा,  मन-घन  घटा, घटते  घटी तारीख कम
मानस  उमस  बचता  गया,  जिउ ताव तप तपता हूँ मैं

तट  कट  बहें  मझधार  पर,  पर  संग  रहो तुम धार पर
अविरल  तुम्हीं  को  देख  कर, हर घाव सह सहता हूँ मैं

धमनी  में  धर  धूधुर-धुआं,  माया  के  छाया जाल  मथ
इतना  बिलोकर  तुम  जहां,  उस गाँव  बस  बसता हूँ मैं

Apr 21, 2011

इतने दिनों के बाद रात ...

बात सपनों की  ये  बारात,  रात  जग अफ़सरी  जगमगाई  है
कुछ  हैं  ख़्वाबों  से  बदर,  उधर  जल  जलपरी  नींद  आई  है

जीव की  जान  गड़ी हूक,   मूक  में  गुमशुदा  ख़्वाबों की भूख
जबर  ये  भूख  है  शाइस्ता,  आहिस्ता   ये  हूक  भी  सौदाई है

ये थके हाथ उफ़ थके पैर,  गैर  के  द्वार  थके जज़्बात की सैर
थकी सिलवट है खुली आँख,   झाँक  कहती  वो  सुबह छाई है

यूं कैसे मान लूं बयानात,  हालात कि ढल चली  है  महल रात
फकत क़ानून के तहत, तखत बताए  किस पाए पे सुनवाई है

देख ली  नाम  से  निकली,  वली  बड़ों  की  यूं नीयत छिछली
ये  ताकत है ता क़यामत,  नियामत है कमज़ोर में अच्छाई है

कौन  अच्छा है  क्या  बुरा,  चुरा  सुकूं  अगर वो चारागर चरा
ये हो न हो  नहीं खबर,  गर जो  खुद से जीत लें  लड़ी लड़ाई है

जिन्हें इस इल्म का इरफ़ान, फ़रमान पे जिनके मुरीद कुर्बान
क्या  उन्हें  इल्म है  गाफ़िल, हासिल  ये जो इल्म में रुस्वाई है

कभी  पहले  भी  थे  यहाँ  जवां, जुबां के दायरे हसरत के मकां
वो   भर तारीख  में  नहीं,  यहीं  महफ़िल  में आलमे तन्हाई है

भूल जा  भूलते जाना,  माना सर न  सहारा  है  भरम  ज़माना
रेत शहतीर में है  चाह है गुम,  तुम-हम के  टेक  हैं  परछाई है

भूल कर फिर से  मैं जो  याद करूं,  भरूं जो याद की भरपाई है
रात गुम ख्वाब है  बातों की बात,  बात रंग स्याह से रंगवाई है

Feb 10, 2011

आदतन

ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर
अगर वैसा किया होता, किया जैसा नहीं तब पर मगर
जो हो नहीं पाया, उसी पर दिया-बाती सोचना
अवधारणा की ताक से मन कोंचना, भर पोंछना
फिरकी कवायद है, गए जाए की चुप आलोचना
पर है सनद में ठस कि ज्यों - ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर

अगर जो उन दिनों, दाएँ न मुड़, बाएँ चले जाते भला
या तोड़ते ना एक दिन, वैसा किताबी सिलसिला
ये काम ना कुछ और करते, उस किसी जन की तरह
तम बंद ना होता, खुला होता गगन इसकी जगह
पहले ही उड़ जाते, धरा का मोह था जी का शगल
कहते थे जो अपनी ज़मीं, किसकी वो थी सदियों पहल
मिट्टी के मन का स्वाद, जो अवसाद रह कर भरभरा
उनके लिए कुछ और कर पाते, दरकता किरकिरा
किरचों में मिर्चों सी कई, यादें गईं शामो-सहर
पाते नहीं चश्मे सहारों में, न खोते ख़ाक जो खोई नज़र
तो देख लेते वो कि जो – ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर

किया जो एक मौसम में, धुओं में बारिशों में भीगते
कुछ आग तारों की छुड़ा, दिन दूब की जड़ सींचते
तब रतजगे लगता था, जुगनू वास्ता है एक का
फिर कुछ दिनों के बाद, आए रास्ता समवेत का
खर-बखत छापे भीत पर, सीखे तजुर्बे जो हुए
देखे पुराने काफिले भटके, चमक के बुर्ज धूसर के जुएं
अब दो-पहर दो-राह दो-मन दो-विधा की तल धरा
गड़ती किलक की बात, सबने क्यों नहीं उतना करा
जो हो नहीं पाया, लदा बेताल सा काँधे इधर
पूछे कहो नश्वर गए उस राह के नक़्शे किधर
उस वहाँ होना था जहां - ऐसा नहीं तैसा हुआ होना तनिक बेहतर

एकमन बांच ले जितना, सभी होता नहीं एकमन कहा
इतनी बड़ी दुनिया में, सगरे मन अलग अपनी तरह
अपनी कही के दाह में पकती गवाही चाह में
ले कर चलें फ़ाज़िल पढ़े लिक्खे बहस की राह में
है अलग सच सबका अलग अपने अलग की क्या कहें
है प्रेम जिनसे उनसे भी अक्सर असहमत से रहें
ऐसा न था उस रोज़, जब ये पार या वो पार हाँ
चल-खरल पीसे एक सुर ये जीत या वो हार क्या
साधे न मन सब तार उचटे आज से छटपट उधर
माने न जाने तब किया कुछ बचपने से तर-बतर
ये उम्र का कहना अगर - ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर


अगर वैसा हुआ होता महज, होता भी जाता काश कर
क्या खैर ना उल्टा उधड़ता, काश के अवकाश पर
जैसे हमेशा, शोक के पल, लोप लेते हैं खुशी
औ दुःख के दिन भी सदा तो, रहते नहीं है ना कहीं
बदली में रहना और बदलना चाँद का आकाश में
चलना स्वतः विद्रोह में या मोह माया पाश में
चूंकि गरम है भेस कम्बल छूटते ही जाएंगे
चूके दिनों के देस मज्जा में कहीं जम गाएंगे
जो गुनगुनाएंगे मसहरी में चुनांचे रात भर
हर नींद को, हर चैन को, दे जाएंगे थोड़ा सा ज्वर
सुन रहगुज़र - ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर


ये हो सकता है, ये सब कल्पना हो, अल्प तुक आलाप हो
जिसकी जिरह खारिज हुई जाती है, मद्धम ताप हो
या है दिमागी दौर, रसायन का विरल संकोच है
जो कल बहल जाएगी, ऐसी आज की जल सोच है
जो भी है, कठफोड़वा कसक के एक कोने भल बसा
ना मुस्कुराया मन, चहक मुख मोर जिस भी पल हंसा
समतल तुले रहने की कोशिश, नट कला का कष्ट पद
तुक बेतुकी मुश्किल नहीं, मिल जाए खुद की एक हद
वो छोर, जिस की डोर से, बाँधे खुलें उतने ही स्वर
एक बात जो कह दें मुखर, सब हो भी सकता था अधिक बदतर
अगर वैसा हुआ होता कि जब - ऐसा नहीं तैसा हुआ होता तनिक बेहतर

Dec 2, 2010

कैलाइडोस्कोप कनफुसिया

गलत ढूंढते हैं सही ढूंढते हैं,
जो सब ढूंढते हैं यहीं ढूंढते हैं
जो मिलता नहीं बस वही ढूंढते हैं
वो मिल जाए गर तो कमी ढूंढते हैं
कमी से परेशां ज़मीं ढूंढते हैं
ज़मीं भी बहुत दूर की ढूंढते हैं
बहुत दूर खुद में नमी ढूंढते हैं
नमन अनमने बन खुदी ढूंढते हैं
खुदी में खुदा बंदगी ढूंढते हैं
खुदा नाम बंदे बदी ढूंढते हैं
बदी नेक से सट लगी ढूंढते हैं
लगी में तने ताज़गी ढूंढते हैं
गुमे फूल पत्ती हरी ढूंढते हैं
कांटे जो चितवन हँसी ढूंढते हैं
हँसी घुलमिली पी खुशी ढूंढते हैं
खुशी इश्तिहारों की सी ढूंढते हैं
मुनादी में खबरों का जी ढूंढते हैं
खबर हो डरों में डली ढूंढते हैं
डर की वजह की धड़ी ढूंढते हैं
वजह से धनक गड़बड़ी ढूंढते हैं
शुबहे बा शक हर घड़ी ढूंढते हैं
टिकटिक न जानी कही ढूंढते हैं
अज़ानों में अपनी सुनी ढूंढते हैं
अँधेरे जला रोशनी ढूंढते हैं
सुबह रोज़ की हड़बड़ी ढूंढते हैं
जल्दी जली दोपहरी ढूंढते हैं
जले शाम हाज़िर छड़ी ढूंढते हैं
सहारे इमारत खड़ी ढूंढते हैं
साँपों में सीढ़ी चढ़ी ढूंढते हैं
चढ़े हों तो पारे कई ढूंढते हैं
कई मन के मारे परी ढूंढते हैं
परीज़ाद सपने नई ढूंढते हैं
पुराने रिसाले बही ढूंढते हैं
बाढ़ों से बच कर रही ढूंढते हैं
सूखे सफर तिश्नगी ढूंढते हैं
पिपासा जिज्ञासा रंगी ढूंढते हैं
रंगों में फ़ाज़िल कड़ी ढूंढते हैं
कड़ी जोड़ती फुलझड़ी ढूंढते हैं
पटाखों में बड़की लड़ी ढूंढते हैं
फूटे बरस की भरी ढूंढते हैं
भरती नदी और तरी ढूंढते हैं
लहर से किनारे ज़री ढूंढते हैं
किनारों के खोटे खरी ढूंढते हैं
खरी मनकरी मसखरी ढूंढते हैं
ठठ्ठों से जहमत बनी ढूंढते हैं
बनों में छितर चांदनी ढूंढते हैं
सितारों पे हरकत जगी ढूंढते हैं
नजूमी कलम दिल्लगी ढूंढते हैं
कल के नज़ारे अभी ढूंढते हैं
गुज़रा हुआ कल सभी ढूंढते हैं
जो है उसमें कुछ बानगी ढूंढते हैं
सांचों में सच सरकशी ढूंढते हैं
बगावत के पल हमनशीं ढूंढते हैं
रिन्दों में पर्दानशीं ढूंढते हैं
पर्दों में बातें बुरी ढूंढते हैं
बदमाश सारे नबी ढूंढते हैं
शरीरों में शहरी शबी ढूंढते हैं
कस्बों में हसरत दबी ढूंढते हैं
दबे गाँव गाड़ी रुकी ढूंढते हैं
सिगनल में तीखी सखी ढूंढते हैं
मिर्चों से आँखें धुंकी ढूंढते हैं
नज़रें उतारे यकीं ढूंढते हैं
भरोसे फलक में मकीं ढूंढते हैं
पता नाम सा कुछ कोई ढूंढते हैं
कहीं कुछ भी हासिल नहीं ढूंढते हैं
हिसाबों की गोली दगी ढूंढते हैं
लगी जो लगन की पगी ढूंढते हैं
पग थक गए बेदमी ढूंढते हैं
मुक़र्रर के दम ज़िंदगी ढूंढते हैं
ज़िंदा मुरादें सगी ढूंढते हैं
अपने से सब आदमी ढूंढते हैं
अलख ढूंढते अलग ही ढूंढते हैं
वो जो हैं जहां वो वहीं ढूंढते हैं

Nov 4, 2010

बेनकाब बेशराब

उफ़-आह  रंग  साज़   हैं,  लुब्बे  लुबाब  में
बेलौस  बांटते  हैं   सिफ़र,  दो  के  आब में

नीचे सिफ़र दिया, यही ऊपर की सल्तनत
ऐसा बयाँ इस साल भी, लिक्खा किताब में

कैसा  बयान था, वहाँ  किसका  मकान था
चल बाँट लें बन्दर के नांईं,  सब हिसाब में

इतनी कमी ज़मीं  की  बसर  में हुई,  पता
सामंत की  नज़र  है  अब के,  माहताब में

आकाश से  ऊंचा हुआ ,  उठकर गया जहाँ
जाती नहीं  आवाज़ तक, उस आफ़ताब में

आवाज़  गोलियों से  गालियों से,  दाब  दो
या बस  ख़बर से दाग दो,  नक़्शे जवाब में

ख़बरें  चमक  रहीं हैं,  बरसते  महा नवीस
चींटों के  पर  झड़ जा रहे, साहिब रुआब में

झड़ के गिरे पत्ते कहें, चिड़िया से डाल की
हम पर वे  चलके जाएंगे,  तेरे ही ख्वाब में

जो ख्वाब चंद आँख का, वो  खाम ख्वाब है
क्या  देखता  है  सुरसुरी,  बंद के हिजाब में

Oct 31, 2010

निशाचरण

यों इत्ते सा कड़वा है काफ़ी गुलाबी, ओ मन इससे ज्यादा न करना कसैला
रे दुखवा रे जा जा ओ रतिया के छैला

रे  जा जा  बहस का  गगन खुरदुरा है
उमस   का  गहन  लोपता  फरहरा है
खोले आँखें  तमस की पहर तीसरे में
गजर  का  वजन   गाज  का दूसरा है

ये टिकटिक की घड़ियाँ हैं भारी प्रभारी, विभा का समय चूर दिखता है मैला
रे दुखवा चला जा ओ रतिया के छैला

रे जा  अब कभी और जा  कर  सुनाना
सजा का  तरन्नुम  विषादों  का  गाना
उठा  सब  तमाशा,  हताशा  की  भाषा
फसक का फ़साना, यही  बस  बजाना

साज़ पकडें कहाँ  सुर लगा दूसरा जी,  लो जी भर  गया  नाद तनहा बनैला
रे दुखवा रे गा जा ओ रतिया के छैला

रे जा  ना   उठा  जा  रे  गल्ले से  छल्ला
ये  हल्ले में  हल्ला  ये  इल्मों का इल्ला
घिस-घिस गिला पिस मिला हाथ में जो
जुड़ीं  चार  दमड़ी   झड़ा  एक  अधिल्ला

अन्धेरे   उगलते  अठन्नी  का  मीठा,  बढ़ा  खून  चीनी,  खिलाते  करैला
रे दुखवा जिमा जा ओ रतिया के छैला

रे  जा  भाई रे,  थक   गए  जाग के  दम
गिने  कितने  गिरते  दिनों  में  मुहर्रम
निशा  दीप  में   याद  की ज्योतियों  में
मोतियों  सीपियों  सागरों  में जमा गम

मनन  से  कई  देव दानव  निकाले,  सुधा की  सुराही  पे  छींटा  बिसैला
रे दुखवा पिया जा ओ रतिया के छैला

रे जा कर न जा,  रह  भी जा धुन्धपाती
यूं  भर-भर   बढ़ा  जा, कलेजे की थाती
रात साथी   है तू,  कूचे  लम्हों  के बाबा
अजूबा   खुशी,   बात   आती   है  जाती

सरापों  में  बुलबुल  सियापों  से  मेला,  महाकाल  अंतिम बसेरा उजेला
रे दुखवा न जा रह जा रतिया के छैला

..रे दुखवा  न  जा  छोड़  जा ना अकेला
..रे दुखवा सुला जा ओ रतिया के छैला
..रे दुखवा..