Jan 27, 2008

रोटी बनाम डबल रोटी ?

थोड़ी मोहब्बत सभी पर उतरने दें
थोड़े करम चाहतों पर भी करने दें

सितारों की महफ़िल रहे आसमानी
ख़ुदा बंद जड़ को, ज़मीं से गुज़रने दें

बूंदों के रिसने को रोकें नहीं बस
सागर रहें, अंजुरी भर दो भरने दे

जब छूट पाएं वो फ़ाज़िल सवालों से
बैठक से बाहर, नज़र चार धरने दें

नर में नारायण, क्या ढूंढें मरासिम
का़फ़िर सनम, बुत-परस्ती तो हरने दें



खुलासा :
माना कि हमारे "बच्चे" कहीं पसंद कहीं नापसंद हैं
दोस्तों ने बात जो कही, हम ख़ुद भी रजामंद हैं
पर रेशम कहाँ से लाएं? कि हम कातते कपास हैं
अपने समय, जेबों, जिगर में यही छुट्टे छंद हैं

स्वागत एक बार फिर [:-)]


Jan 26, 2008

शब्द बौने

शब्द बौने
पायलों में रुन्झुने
ईख के गंडे चुने
हैं बड़े नटखट, सलोने
शब्द बौने

शब्द बौने
ले उडे तारे, चमाचम
चाँद, मारे आँख हरदम,
साज ताजों के बिछौने
शब्द बौने

शब्द बौने
कौंधते बिल्लौर घन
जोडें जुगत जादू जतन
पकड़ते कुर्तों के कोने
शब्द बौने

शब्द बौने
खेलते खिलते लड़कते
कात बातों को जकड़ते
क्यों लगे इस ख्वाब रोने
शब्द बौने

शब्द बौने
एक दिन साधन बनेंगे
आसमां आँगन बनेंगे
पर अभी छोटे हैं छौने
शब्द बौने

शब्द बौने
बाज क्यों ताने निगाहें
आस्था आगे की राहें
प्रार्थना ना जाए सोने
शब्द बौने

Jan 18, 2008

घुमक्कड़नामा -शून्य

टहलते,टहलते, गमक गुनगुनाते, रास्ते चमकते, चमक रूठ जाते
लरजते बरजते, खयालों में आते, रातों में छपते, छपक टूट जाते

बहानों से किस्से, गुमानों के मंज़र
तरीके बदलते रहे ख़ास अवसर
सलीके सुलझते अगर चैन पाते
वहीं आ गए इस सहर, घूमफिरकर

रिझाते ज़हन को कहीं थाम छाते, जहाँ बारिशों के से परिणाम आते,
अगरचे-मगरचे पहर भूल जाते, कमर कस के साथों में गोता लगाते

कहीं झाड़ झंखाड़ रखते बसाते,
वहाँ बाग़ बागों कनातें बिछाते
खटोले जगा कर, किताबें सजा कर
अकस्मात चलने के वाहन बनाते

करीने से बक्से में कपडे तहाते, ताले की चाभी गले में झुलाते
हथेली उठा कर, हवा में घुमाकर, अकल से सफर के बहाने बजाते

कम-सख्त मौसम, कहाँ रोक पाए
चलते चले बात बोले बुलाये
जहाँ भी रुके, वक्त छोटे हुए
वहां कुछ नए और सम्बन्ध आए

बगल के मकानों की घंटी बजाते, मुसकते नमस्कार कहते कहाते
तलब रोज़ रफ़्तार फ़िर ताक धरते, थिरकते थकाते शराफत उठाते

धड़कते कंगूरों में जगते धतूरे
काहिल, कलंदर, जाहिल, जमूरे
बड़े नाम कामों के स्वेटर बनाते
पड़े ख़त किताबत रहे सब अधूरे

किसी नाम अपनी पिनक दिल लगाते, कहीं बोतलों में खटक बैठ जाते
सरी शाम रोशन मजारों से तपकर, उमस दिल्लगी की पसीने बहाते


उपसंहार : (१) इस पोस्ट का जन्म मनीष के ब्लॉग ( http://ek-shaam-mere-naam।blogspot.com/2008/01/blog-post_15.html) में टिपियाने के दौरान हुआ (२) बहुत मन था कि " जेबों में चिल्लर खनकते बजाते,..." प्रयोग करूं लेकिन वो यूनुस का कॉपी-राईट है इसलिए फिर कभी (३) पिछली पोस्ट की हौसलाअफजाई सर आंखों पर

Jan 15, 2008

एक कविता लिखने की कविता

चल-चल, निशा की सोच में, मानव जगाले, चल
आ चल, कलम की नोक से, कागज़ जलाले, चल

दीखे दाख हैं दिन भर
खड़े गल्पों के रेती घर
तमन्ना की रसीदें तम
नयन भर मील के पत्थर

पलक भर भूल दुःख जीवन
अरे लिख रागिनी अनमन
कोई बस पढ़ जुड़ा लेगा
तेरे इस मन से अपनापन

द्वार दर खोल दे, खुल-खुल के हंसले, मुस्कुराले, चल
आ चल ... ......

दिन-कर के थके हारे
बसों ट्रेनों से भर पारे
भरे झोले में सच बावन
सम्हारे घर सुपन सारे

बैठ कर साँस भर सुस्ता
अभी काबिल बहुत रस्ता
पोंछ दे भ्रम की पेशानी
सहज जंजीर भर बस्ता

ठहर तब-तक, तनिक शब्दों से अपने, बदल पाले, चल
आ चल ... ......

सरल मसिगंध हो कर बढ़
अगम सम्बन्ध की नव जड़
उमड़ गढ़ स्वप्न में घन-बन
रचा अल्फाज़ से अंधड़

लिखे धारों में, नावों में
सुप्त बदरंग भावों में
बिछे फाजिल किनारों से
उन्हीं उन सब बहावों में

डुबा दिल, दम लगा, दम ख़म बढ़ा, मन आजमा ले, चल
आ चल ... ......

Jan 6, 2008

राम राज्य (१९४६ में लिखी एक कविता )

६ जनवरी २००२, ६ वर्ष पहले, बब्बा (पिता, श्री जगदीश जोशी ) ने अपना यहाँ का सफर समाप्त किया था । एक भरपूर तेज, उत्साह, उमंग, संवेदना, संघर्ष, आवाज़, यायावरी और वैसे ही सारे संवादों को जीने के बाद । संताप से नही वरन उनकी पूरी लगन से जी हुई ज़िंदगी और जिजीविषा के मान, बतौर अनुष्ठान, आज उनकी पुरानी कविता यहाँ लगा रहा हूँ । इसलिए कि एक तो आपको उनसे मिलाने का इससे अच्छा बहाना न मिलेगा और दूसरे कविता चाहें है पुरानी - संदर्भ से साझी है । १९४६ में उनकी उमर बीस को छूती सी होगी । २००८ में मैं बयालीस का हूँ, कसम खाके कह सकता हूँ कि इस तरह के भाव या शब्द विन्यास पकड़ पाऊँ तो भाग्य मानूं । इस ब्लौग का "बकौल" नाम बाविरासत है ( इस नाम से वे देशबंधु और आज में लिखते थे ) । बब्बा बहुआयामी शख्सियत थे । हम बच्चों ने, बच्चों के नज़रिये से देखा । सार्वजनिक व्यक्तित्व होने के हम से ज्यादा जानने वालों की कमी न थी ( अगर कविता अच्छी लगे तो साईड में "प्रेरणा और अनुराग" पढें ) । प्रस्तुत है १९४६ की - उसी वर्ष रीवा राज्य कवि सम्मेलन में प्रथम स्थान प्राप्त - कविता । यह कविता उनकी २००२ में संकलित "मिट्टी के गीत" से है जिसके प्रकाशक हैं विभोर प्रकाशन इलाहाबाद (थोडी लम्बी कविता है) - सधन्यवाद - मनीष

शोषित मानव, पीड़ित मानव, भूखा मानव कैसा स्वराज्य
इस उत्पीडन की बेला में, मैं क्या गाऊँगा रामराज्य

कुसुमित जीवन के मधुर स्वप्न, लहराते हैं मधुरिम बयार
वृक्षाली में गाती श्यामा, डालें झुकतीं लै मृदुल भार

कोमल शिरीष की कोंपल भी, नर्तन में आज हुई उन्मन
नीलम के पंखों में शोभित, नूतन पराग के से जलकण

कुछ मीठी मीठी सी फुहार, सिहरन उफ़ कैसी यह पीड़ा
उन्मद कपोल के मन्मथ के, लेखा ही यह कैसी ब्रीड़ा

पदचाप मौलिश्री के परिमल में मिस, वसुधा पर धर जाते
जाने क्यों से अनजाने में, सीधे पादप भी हिल जाते

शोभा की प्रतिमा सी वन में, यह कौन अरे जाती सीता
पति की वरधर्मक्रिया जिसने, स्थावर जंगम का मन जीता

छोड़ा जिसने निज राम-राज्य, वह जाता युग का सेनानी
उस सेनानी के साथ अरे, जाती जन-जन की कल्याणी

निर्वासित हाँ निर्वासन ही, तो पित्र प्रेम है मूर्तिमान
पित्र-इच्छा के आगे जग का, सारा वैभव रजगण समान

हाँ छोड़ दिया घर का वैभव, जग का वैभव पद तल आया
उस पार ब्रम्ह के पीछे ही, माया ने अपना पथ पाया

युग की समाधि में आज मौन, वह नव्य साधनामय विराग
उस निर्वासित के धनुस्वर से, अब भी कंपते हैं शेषनाग

पर आज लालसामय जीवन, विषयों की सान्धें अनविभाज्य
शोषित मानव, पीड़ित मानव, भूखा मानव कैसा स्वराज्य
इस उत्पीडन की बेला में, मैं क्या गाऊँगा रामराज्य

आशाओं के स्वर्णिम विहंग, कूके सरयू के कूलों पर
कोकिल भी भरती अपना स्वर, सुरमित डालों के झूलों पर

तट पर क्यों आँखें ठिठक रहीं, मृग सिंह साथ पीते पानी
केकी के साथ केलि रत सी, कोकिल क्या करती मनमानी

खाटें अमराई के नीचे, ग्रामीण जहाँ लेते बयार
नवयजन धर्म की रेखा भी, नभ के उर में करती विहार

रति सी ग्रामीण नवोढ़ायें, पनघट पर गगरी ले आईं
कुछ अरहर के खेतों में जा, क्रीडा को करने हुलसाईं

हल लिए कृषक के दल आते, गज की चालें भी शर्मातीं हैं
गर्दन की घंटी के स्वर में, कुछ और शब्द भी लहरातीं हैं

हाँ इन गायन घंटी स्वर में, कुछ और शब्द लहराते हैं
जब अन्तरिक्ष में वेदों के, कुछ महामंत्र टकराते हैं

कुछ दूर खेत में रही दूब, को चरने गायें जाती हैं
अयनों के भार वहन करने, में ही मानो थक जाती हैं

उनके आगे करते किलोल, बछड़े मृग शावक से जाते
माँ के दुलार की धमकी दे, अपने में ही कुछ कह जाते

है धर्म न्याय मानव अपनी, रखता है रे अर्जित सत्ता
मानव के स्वर के बिना नहीं, हिल सकता धरती पर पत्ता

वह राम अरे युग का मानव, मानव का ही तो साम्राज्य
शोषित मानव, पीड़ित मानव, भूखा मानव कैसा स्वराज्य
इस उत्पीडन की बेला में, मैं क्या गाऊँगा रामराज्य

वह राम अरे हाँ स्वप्नलोक, की अब जो विगत कहानी है
क्यों रामराज्य का नाम आज, लेते आंखों में पानी है

वह राम और वह राज्य और, वे मानव सब धुंधली रेखा
अब का मानव क्या जान सका, जिसने शोषण का युग देखा

यदि शोषण ही केवल होता, तब भी संतोष रहा भारी,
पर शोषित भी शोषण करता, उल्टी देखी दुनिया सारी

कहते इतिहास बताते हैं, मानव का गिरना ही गुलाम
पर आज गुलामों का गुलाम, बोलो मानव का कौन नाम

कवि तूने देखा राज्य और, आंखों से जौहर भी देखा
दिल्ली को रोटी ले जाते, राणा को भूखे भी देखा

देखा तूने जो सह न सका, मुग़लों की खर तलवारों से
जब छाती पर रानी चढ़ती, खंजर ले कर मीनारों से

हो याद मुझे आई मीना, उसकी भी एक कहानी है
पर देख आज की मीना को, आंखों में आता पानी है

हे लुटा रही माता बहने, अपनी अस्मत हाटों में
रुपयों से मोल हुआ करता, सुन्दरता बिकती बाटों में

दिल चाक हुआ इन गुनाहगार, आंखों ने है क्या-क्या देखा
पद के हित मानव ने अपनी, माता का सिर कटते देखा

कवि सुनो आज हिमगिरि सुनले, सुनलें विजयों की मीनारें
यह महल सुने ऊंचे - ऊंचे, सुनलें ज़ुल्मी की तलवारें

सुनलें जो न्याय बनाते हैं, सुनलें जो मानव को खाते
जो आज धर्म की आड़ लिए, अपने को ऊंचा बतलाते

जिनने छीने मां-बहनों के, वक्ष-स्थल से जा वसन हैं
कहना उनसे वचन नहीं ये, महाकाल के अनल दशन हैं

अरे बोतलों की छलकारें, नुपुर की झंकारें भी
मेरी निर्वसना माँ के, ज़ंजीरों की ललकारें भी

रूप दिया जिसने मरघट का, शस्य श्यामला को अविकल
जिनने मानव को ठठरी में, भूसाभर कर है किया विकल

जिनने माता के लालों पर, संगीनें भी चलवाई हैं
जिनने बेतों से जेलों में ,चमडियाँ बहुत खिचवायीं है

वे संभल चलें युग की वाणी, करवट लेकर हुंकार उठी
सोई नागिन भी निज संचित, विष से सहसा फुंकार उठी

उठ पडा अरे पीड़ित मानव, छीनेगा तुमसे मनुज राज्य
शोषित मानव, पीड़ित मानव, भूखा मानव कैसा स्वराज्य
इस उत्पीडन की बेला में, मैं क्या गाऊँगा रामराज्य
_____________________________

Jan 2, 2008

दोपहर का गान

चलने लगा, चलता गया, बनता गया, मैं भी शहर
बेमन हवा, लाचार गुल, ठहरी सिसक, सब बेअसर

रोड़ी सितम, फौलाद दम, इच्छा छड़ी, कंक्रीट मन
उठने लगी, अट्टालिका, बढ़ती गयी, काली डगर

कमबख्त कम, पैदा हुआ, सीखा हुआ, वैसा नहीं
जिस रंग में, बदरंग था, उस ढंग में, सांचा कहर

उड़ने लगा, चिढ़ने लगा, इतरा गया, धप से गिरा
अब मौज को, क्या दोष दूँ, मेरा धुआं, मेरा ज़हर

आंधी चली, पानी गिरा, गिरता गया, कोसों गहर
तुम बोल थी, मैं मोल था, थी बीच में, ये दोपहर

Dec 31, 2007

अरब, शंख, पद्म शुभकामनाएँ

एक जाता हुआ साल - ३ बहुरि थके देसी शेर - अरब, शंख , पद्म शुभकामनाएँ - एक गपोड़्शंख


वहां सो चुकी है रात, या मौसम सिंदूरी है
तुम्हारे और मेरे बीच, बस बातों की दूरी है

आधे से अधूरे छू गए, थोडी सी बक-बक में
जो रह गए वो मनचले फेहरिस्त पूरी है

इस साल की मीयाद का दम ख़म खतम सा है
नए साल खुश रहना बहुत .. बहुत .. ज़रूरी है


शुभ कामनाएं २००८ की - मां, कार्तिक, किसलय, मोना, मनीष

Dec 28, 2007

फुग्गों की बिरादरी

क्या अभी भी यार तुम, शामें उड़ाते हो ?

चौंकते हो रात में
परछाईयों को बूझते हो,
पलट कम्बल मुंह उलट
लम्बाईयों में ऊंघते हो,
दिन सुने किस्से कहानी
नित अकेले सूंघते हो,
और फ़िर तख्ता पलट कर
चोर मन में गूंधते हो

क्या गुल्लकों में डर डरे नीदें जगाते हो ?
क्या अभी भी ....

तुम, तुम के आने से
अभी कुप्प फूलते हो क्या,
तभी तो सज संवर पुर जोर
मिस्टर कूदते हो क्या,
फुदक कर बात, बातों में
शरम से सूजते हो क्या,
और फ़िर तंज़ तानों से
तमक कर रूठते हो क्या,

क्या हक्लकाकर, मिचमिचा आँखें बनाते हो ?
क्या अभी भी .....

चिरोंजी छीलते हो
टेसुओं से रंग करते हो,
दबा कर पत्तियों को
तितलियों को तंग करते हो,
फकत झकलेट मौकों में
जबर की जंग करते हो,
बचा जो कुछ भी करते हो
सबर के संग करते हो,

तमातम फूँक कर सेमल के लब, फाहे बनाते हो ।
....
कहो न यार तुम इस दम तलक, कंचे लुकाते हो ।
....
कहो तो यार उन सीपों से तुम, कैरी छिलाते हो ।
....
फिर कहो अनकही सांसों से तुम, फुग्गे फुलाते हो ।

कहो ....


[प्यादे को पहलवान के .. आस पास ... बनने में अभी बहुत .. बहुत .. बहुत .. वक़्त है - (लेकिन लिखता कौन कमबख्त है सूरमा बनने के लिए) - उम्मीद से ज्यादा अपेक्षाओं( http://tarang-yunus.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html )का तहेदिल ... ]

Dec 25, 2007

बुन कर

सागरों में सुर, नहीं स्वर, झर रहा है।
आगतों के बीच में घर कर रहा है।

वेदना का मान है क्या ?
धुन बुना सदगान है क्या ?
शब्दशः नश्वर समय में ,
अंततः अभिमान है क्या ?

फिर समर्पण तोलता है ,
अनमना तह खोलता है ,
सर पटकता है वहीं पर ,
धुर उसी मुँह बोलता है ,

अंतरों में मींज कर, नश्तर रहा है।

सृजन का उन्माद है यह,
मगन का संवाद है यह,
निशा निश्चित छिन्न कीलित,
प्रमद का अवसाद है यह,

अंतरालों के शिखर से,
बंद तालों की उमर तक,
बह लगे रेलों के संदल,
स्याह प्यालों के पहर तक,

अमृतों को दंश दे कर, तर रहा है।

Dec 20, 2007

ढलते हुए/ फिर सम्हलते ...

उम्र किस-किसकी, यूं ही सुल्तान होती है।
हड्डी घिसती है, तो ही अरमान होती है।

बेलें चढ़ती-गिरती, हैं दफन दब जाती है।
कोयला बनती है, जो ही जलान होती है।

तार जुड़ते हैं तो तमाशे भी मिल पाते है।
बात जो सच लगे, वो ही जबान होती है।

आ सलाम दे सफर, ये घुप रुकी हवाएँ हैं।
समय की भाप ले, सो ही सोपान होतीं है।

भर समेट तारे हैं, यूं के नमक पारे हैं।
बूँद उट्ठे साथी, तो ही आसमान होती है।

कौम में, अमन-इंक़लाब में, दरारें सोहबत हैं।
फरेब अपनी किस्मत, यूं ही बयान होती है।

[ साभार - उन सब के नाम जिनसे पिछले एक महीने में पढ़ के बहुत नया जाना / सीखा - लुत्फ़ उठाया - इस नवेली दुनिया में कदम बढाया - उम्मीद से कई गुना पाया और उन सब के नाम भी जो आए / पधारे - हौसलाअफजा़ई कर गए / मंडराए - आशाओं से भी ज्यादा पीठ ठोंक के नंबर दे गए - मनीष ]

Dec 18, 2007

चलोगे ?

आओ चलो ...

आओ चलो बादल को खो आएं।

इमली के बीजों को,
सरौते से छांट कर,
खड़िया से पटिया में,
धाप-चींटी काट कर,

खटिया से तारों को,
रात-रात बात कर,
इकन्नी की चाकलेट,
चार खाने बाँट कर,

संतरे के छीकल से आंखो को धो आएं।
आओ चलो बादल को खो आएं।

धूल पड़े ब्लेडों से,
गिल्ली की फांक छाल,
खपरैल कूट मूट,
गिप्पी की सात ढाल ,

तेल चुपड़ चुटिया की,
झूल मूल ताल ताल,
गुलाबी फिराक लेस,
रिब्बन जोड़ लाल लाल ,

चमेली की बेलों में, अल्हड़ को बो आएं।
आओ चलो बादल को खो आएं।

कनखी की फाकों में,
फुस्फुसान गड़प गुडुप,
थप्पडा़ये गालों में,
सूंत बेंत फड़क फुडु़क,

चाय के गिलासों को,
फूँक फूँक सुड़क सुडुक,
चूरन को कंचों को,
जेब जोब हड़क हुडुक,

मुर्गा बन किलासों में लाज शरम रो आएं।
आओ चलो बादल को खो आएं।

खिचडी़ के मेले की,
भीड़ के अकेले तुम,
चाट गर्म टिकिया की,
तीत संग खेले तुम,

चौरसिया चौहट्टे के,
पान-बीड़ी ठेले तुम,
गिलाफ में लिहाजों के,
बताशे के ढेले तुम,

जलेबी के शीरे से दोने भिगो आएं
आओ चलो बादल को खो आएं।
आओ चलो ...

[ धाप-चींटी :- ज़मीन में खाने बना कर खेलने का खेल / धाप-चींटी- चींटी -धाप-चींटी -धाप ; गिप्पी :- पिट्ठू / गिप्पी गेंद / 7 tiles ; खिचडी़ :-मकर संक्रान्ति; चौहट्टा - रीवा का बाजारी इलाका ]

Dec 14, 2007

बैनीआहपीनाला - एक नहीं दो दो

[ बचपन में इन्द्रधनुष के रंग रटने का यही फार्मूला होता था - जब तक अंग्रेजी माध्यम नहीं शुरू किया था ]

बैरंग चिट्ठी के कमज़ोर टिकट,

नीम की टहनी के बगल बनफूल गए।
आहट टटोलते, सरपट में बोलते,
हठीले, पिनकते, बाँहों में झूल गए।
पीस-पीस घोंटें, बहानों की चाशनी,
ना-नुकुर के कामों को, मांगों में भूल गए।
लाले लफंदर, छुटके खेलें गुडिया, जब बड़के स्कूल गए।


(किसलय -१० और कार्तिक - ३ के लिए )

Dec 13, 2007

किर्चों में सजा इन्द्रधनुष

[ १९८६ की लिखी कविता जो अभी तक .. लगभग .. याद है - ब्लौग शुरू करने के पहले की शायद आख़िरी ]

जब,
सपने टूट गिरते हैं,
पतझड़ के पातों से, रूखे / मुरझाये
राख की मेड़ों से, ढहते/ भुरभुराए
दिशाएं जब, बन पड़ती हैं तमस घनघोर,
और लीलने लगता है - एक, शून्यलाप कठोर,
तब कहीं
ढ़ुलकी बूंदों से,
धरती बन जाती है नरम
फूट पड़ता है अदद अंकुर,
रुकता नहीं क्रम
हो न हताश
मत छोड़ विश्वास
उठ पुरूष ,
जीवित है इन्द्रधनुष

Dec 12, 2007

छोटे सवाल

आसमां का रंग बदहवास आसमानी क्यूं है?
अमां इसी बात से कचहरी में परेशानी क्यूं हैं?

लौट आयेंगे सब तारे वो अँधेरा तो मुंह ढले
छुप छुप के ओट बैठी ये नौजवानी क्यूं हैं ?

हम हाथों में बरक़रार है सांसों की नर्म साख
कजरे की तहें सोख के ये गरम पानी क्यूं है?

हाँ हम रहेंगे उम्र भर तक इस भरम सही
तो हर करम की उम्र अब तक सयानी क्यूँ है ?

सामान तो समेट के रख लें हर ज़िंदा पल
किस कल जिलाबदर हो ये कहानी क्यूं है ?

Dec 5, 2007

दो बातों के बीच की जगह ...

अथ

मौन की बड़ी ई... ई..... लम्बी उम्र,
नापती रही पटरियों के खुमार;
और चुप की आँखें सजीलीं,
ताकतीं रहीं देहरी दुआर;

गाँठ को बांधकर, याद सो तोलती रही / मद्धम;
होंठ से झेंपकर, नींद में बोलती रही/ सरगम;

सकपकाए शब्दों को, पीती रही / रोशनाई;
भूल गई , झूल गई , रीती भई / अंगडाई;

कभी -कहीं मिले नहीं,
कृष्ण, करुण , स्मृति बुहार ;
कहीं -कभी छूट पाए,
शेष प्रश्न, स्वर , सिंगार ;

पतझड़ के भूरे से, पात के अधूरे में / बांधे ;
रात चढी सांसों से, गर्म नर्म बातों में / आधे ;

उँगलियों की झिरी से, जाले से देखा / मुस्कुराये;
अटपटे संवाद चढ़े , फले, महके /हिचकिचाए ;

टिकटिकी निहारों में,
आज फिर, अनेक बार ;
शर्म के कगारों में,
तोल, मोल, जोड़ प्यार;


इति

Nov 29, 2007

प्रार्थना

साधन को दो संदर्भ प्रभो, मैं कंद कंद मंडराऊं,
इस द्वार तुम्हारी समता को, फिर मुक्त्छंद में पाऊँ

फिर शब्द मिलें आवेदन को
आदर्श मिलें संवेदन से
लपटों को जोड़े कर्मराग
आवेग जुड़ेँ स्पंदन से

साभार दिवा के पुरास्वप्न,
मरू मर्मर के त्रासद घर्षण
जब एक बनें आदर्श नाद
सम्पन्न प्रथम शोषित जन गण

उत्सुक्त बनूँ, संक्षिप्त बनूँ, निश्वास उठे, आभास बनूँ,
वनवास मुक्त संतृप्त रहूँ, उन्मुक्त्कंठ से गाऊँ

साधन को दो संदर्भ प्रभो.......

चौड़े हों फैलें , नीक काम
छोटे बन फू़ हों लोभ साम
सब राज काज निष्कपट सजें
बैरी हों छूटें भेद दाम

शैशव के मूल्य मढे हर मन
मूल्यों का समय चढ़े यौवन
भाषा से कोई नग्न न हो
च्यूंटी काटूं तो स्वप्न न हो

तर्पण कर अगिन परिच्छा का, वर्णों की पूर्व प्रतिष्ठा का,
दर्पण की धुंधली किरणों में, हाँ रंग रंग मुस्काऊँ

साधन को दो संदर्भ प्रभो.......

[ अभी और भी है ???? ......]

Nov 26, 2007

शायद खुश

नींद को रात न मिली, गुम गुम सी हुई
भोर की बात मिली, तो बेहतर थे

सूखते एक किनारे से किनारा कर, कर
मोटी बरसात चली, तो बेहतर थे

बागी़ तक़दीर के बोसे, मौसम नम, नम
हंसी की फांक जली तो बेहतर थे

बकौल हाशिये से , सिफ़र के अगल, बगल
गीली बारात ढली, तो बेहतर थे

अधेड़

.....

इस बार बैठे ख्यालों में रंग नमकीन नहीं
मेरी शोहरत के बवालों में, संग दूरबीन नहीं

पास की नज़र में, लग लगा काला टीका
उम्र रौनक की सही, पर इतनी बेहतरीन नहीं

पैर बिवाईयों के जोर ही चलें, ओस की सरहद
नाक के नुक्कड़ की किस्मत, तमाशाबीन नहीं

शोर कितना करे ये जोश, मगज मारी के चले
जुबां की चुप पे सगे गोश्त की संगीन नहीं

आज इरादे को मेरा जिस्म सोख ले कैसे
जिस पसीने में तेरी सोच नाज़नीन नहीं

ए सबर मालिक, के नींद अभी बाकी है यहाँ
ये खबर के अजगर की रूमानी आस्तीन नहीं

आज अभी दिल नहीं दो उँगलियाँ उठाने का
वरना इस सोच की आज - अभी आमीन नहीं

...
इस बार बैठे ख्यालों में रंग नमकीन नहीं
मेरी शोहरत के बवालों में, संग दूरबीन नहीं

Nov 19, 2007

स्वागत / एक, दो, तीन चार

लिखना शुरू करता हूँ कि....

"कांच के कोठरे में पत्थरों का ढेर, मैं हूँ या मेरा भ्रम;
कौन देखता रहता है, इन किर्चों के जुडे रहने का क्रम;
आज बर्फ पिघलते - कैसे बहेगा नद .... भीम या मद्धम ? "

फिर रूक जाता हूँ और उचक कर धूसरित खिड़की के दूसरी ओर का जमा खर्च नापने में जुटता हूँ। पहले आवारापन को चलाने... बकौल ...

एक अदद घर है । घर की बाहरी दीवार है । दीवार के पार गड्ढे वाली सड़क के पार लटका पुराना छज्जा है, नाई की दुकान के ऊपर, जिसकी ईंटें मटमैली काईयों के अंग लगी हैं। बिजली के तारों और पतंग के मंझों और मकडी के जालों और कौवे के जुगाडे तिनकों की संवेदनाओं में उलझा स्तंभ छज्जे के बायीं तरफ अभी भी बरकरार है , हालांकी पिछली बारिश ने उसे हल्का उम्रदराज़ और बना छोडा है। झूलता सा है ज्योंकि पैरका कंक्रीट कीचड से हिल गया है - लगता है बगल की पुरानी नीम पे अब गिरा तो तब गिरा । लेकिन गिरेगा नहीं और मोहल्ले भर के केबल के तारों के जंजाल को समेटे रहेगा और सुनता रहेगा हार्मुनियाँ की दुकान से निकलता दर्द -ऐ - डिस्को या जो भी ताजा तरीन हित गीत है - जब तक कि तमाम सड़क गीत के आलाप से त्रस्त हो जाये और गीत अपनी पायदान दर पायदान ढुलक कर अगले को मौका दे ही दे ।

पुरानी नीम कि निम्बौलियाँ हर साल की तरह खम्भे के पैरों में गिरेंगी और मुँह अँधेरे गली के शोहदे नीम की टहनियों के जोड़ भी तोड़ेंगे और फिर दातूनी आजमाईश करने के बाद चाय कि दुकान में बैठ कर ताजी अफवाहों का बाज़ार गर्म भी करेंगे । छज्जे की पीठ पार जहाँ मेरी नज़र नहीं जाती वहाँ की न तो मिट्टी दिखती है और न ही धूल । ............

तमाम हो चुकी / हुई थी पुरानी बातों की तरह यह भी एक सपना है , कल्पना है, कांच का कोठार या पत्थरों का अम्बार - लेकिन जो ज़माना ऐसा सच था, वैसा बसर था, अभी, इस जमात तक पहुँचते पहुँचते उसके बडे-सारे किरदार तो मर खप गए, वो जहाँ के थे वहां कस्बा बढ़ कर शहर में घुल गया, उस कस्बे के सतरंगी रिक्शा बदले काले पीले ऑटो / टेंपो में, चौराहे के सफ़ेद वर्दी वाले पुलिसियों की जगह आ गयीं लाल बत्तियों में, कम्पोसिटर हो गए कंप्यूटर, खड़ंजे डामर खा कर सडकों में बदले क्यूंकि नगरपालिका का विकास नगरनिगम के नाम से हुआ, कुछ पार्षद बने विधायक, थोडे विधायक तब्दील हुए मंत्रियों में, लाल, नीली बत्तियों की गाडियाँ बढ़ी, फली, फूली ।

समय दूसरा है सदी दूसरी है, कुल मिला के सिवाय पटवारी और मुंशी के, गुणा भाग एकदम दूसरा है।

दुनिया पार कर दौड़ते, समय के एक कदम पीछे कदम सम्हालने में अपनी इकहरी कमर में दोतहे बल पड़े, बालों में छ्टान - घटान और उनकी सफेदी में जुड़े जोड़ । क्या जोडा - चार दीवारें - दीवारों में सीलन वाली पपड़ी, किताबे और ढेर सारा चाय पीने का सामान । रंग वाले एल्बम में पीले पड़ते लम्हें , (अब ) दैनंदिनी के नए सन्सकरण और निजी, व्यक्तिगत भ्रम, सवालों के अम्बार और जवाबों के पुलिंदे ।

पिछली कलम की सियाही बहुत धुंधली है और इस कीबोर्ड की चमक तेज है। फिर भी मैं अपने भरम का मालिक, समझता हूँ, कि कभी कभी जो नहीं है उसकी सोच का लुत्फ़ है तो सही। माने रोज़ के बही - खाते से तंग दिमाग को कहीं सैर पर ले जा कर बहलाना फुसलाना वगैरह वहैरह। बशर्ते नए - पुराने की बहस अपने आप से चालू न की जाये। दिमाग का बायाँ हिस्सा पुराने की वकालत करे और दायां हिस्सा नए की और आपका मुँह बगैर बोले होंठ हिलाये और बीवी परेशान हो जाये कि पतिदेव का स्वलाप किसी अंदरूनी नए ज़माने की दीमागी बीमारी का इशारा तो नहीं ।

हज़ार बार कोशिश करे कि ऐसा न हो फिर भी होता है - मानो न मानो अपने आपसे वाद विवाद का गुल्ली डंडा अकेले बैठके खेलने का खेल तो है वैसे ही जैसे अपने भरम की गरमी को समेटे जिलाये रखना । और फ़िर पूछना अपने आपसे सवाल - एक नहीं अनेक - और शुरू करना सम वेदना से विषम वेदना के बीच अंगुली से बटन दबाना -

कह दे माँ क्या देखूं ?
केंचुल उतरने का समय है क्या ?
एक सांस के पीछे की सांस में कितना स्टेमिना बचा है ?
दुनिया गोल ही है न ?
क्या वहां भी बुलडोज़र चलने शुरू हो गए होंगे ?
कौन कहता है कि यहाँ सड़कें तेज भागती हैं ( उम्र भी ?)
सच्ची कि पुराने शहर के इतिहास का एक छोर पुनः प्रगति को समर्पित होने के लिए आतुर है ?
क्या किसी और के पास भी उन यादों का पलस्तर रुका है ?
भ्रम मेरी कमजोरी है या आदत ?
डर मेरी मज़बूरी है या नशा ?
खाकी, नीला , हरा या नारंगी ?
ताक़त, शोहरत या सुकून ? (सच में क्या ? )
खिचडी में रंग कौनसा ?
भूख की कितनी उमर?
किसका कितना मोतियाबिंद ? और... और ... और .. ??

पहला पहले भ्रम के नाम, दूसरा डर के लिए, तीसरा अगले सोच की आनेवाली आज़ादी को और चौथा उन सभी को जो मेरी संवेदनाओं से थोडे़से जुड़ते हैं - स्वागत

Nov 17, 2007

प्रथम

मेरे सहमे कदम, दरवाज़े तक टहलते, ठहरे
अभी भी दस्तक की दहलीज़ थमे, हिचके इकहरे
मरोड़ता रहा हथेली के मुहाने,
अभी वक्त को शुरू होना हैं
इस बार कलम को नहीं उँगलियों को सहेजना है
.....शायद