Dec 25, 2007

बुन कर

सागरों में सुर, नहीं स्वर, झर रहा है।
आगतों के बीच में घर कर रहा है।

वेदना का मान है क्या ?
धुन बुना सदगान है क्या ?
शब्दशः नश्वर समय में ,
अंततः अभिमान है क्या ?

फिर समर्पण तोलता है ,
अनमना तह खोलता है ,
सर पटकता है वहीं पर ,
धुर उसी मुँह बोलता है ,

अंतरों में मींज कर, नश्तर रहा है।

सृजन का उन्माद है यह,
मगन का संवाद है यह,
निशा निश्चित छिन्न कीलित,
प्रमद का अवसाद है यह,

अंतरालों के शिखर से,
बंद तालों की उमर तक,
बह लगे रेलों के संदल,
स्याह प्यालों के पहर तक,

अमृतों को दंश दे कर, तर रहा है।
Post a Comment