Apr 8, 2008

उदारीकरण : उपसंहार

बाज़ार के बीचों बीच भरापूरा धंसता हुआ,
बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
पीछे मुड़ कर देखता है / आगे चलता है,
पोले खम्भे से भट भिड़ता है,
पीछे देखता ही क्यों है?
लम्बी दौड़ का कछुआ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ
पीछे देखता है शायद,
बाज़ार के मुहाने से पीछे का अरण्य,
जिसमें अभी भी हिरन, खरगोश, गिलहरियाँ हैं शायद,
शेर, छछूंदर और कनखजूरे, इल्लियाँ और तितलियाँ शायद,
बेताल, बनदेवता और बनमानुसों के अलावा,
कितने और सारे खोये शायद,
उल्टे पैर, तोतले स्वर, पीपल के गाछ,
भय से अचरज से अपवाद बनते हुए,
पत्तियों के साथ-साथ खाद बनते हुए,
और देखता है शायद/ उठता,
उपलों में सीझा धुआं ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
कंधे झाड़ता है,
सम्हलता है,
अपनी झेंप में विश्वास,
और कनखियों में साख,
(और आदमीयत?) की पुष्टि मलता है,
और चलना शुरू करता है/ फिर आगे चलता है,
खुले अखबारों चीखते चैनलों को चीरते संसार का जायज़ा लेने में व्यस्त,
अस्त और उदय की जुगलबंदी में लगातार त्रस्त,
अविश्वास की मौज में छंटा विद्रोही,
डिग्रियों, साक्षात्कारों, असल-नसल और जनमपत्रियों का बटोही,
लपक कर लपकता है,
कुछ अपने हिस्से की दुआ ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
आगे सा ही बढ़ता है,
तमाम जगती, जगमगाती, रोशनियों,
रेहड़ी, दुकानों, और उनके निशान- परेशानियों को पूछता,
ताकते, टोकते विज्ञापनों में पुरस्कार ढूँढता,
निशेधाज्ञाओं और षड्यंत्रों की जद्दोजहद में,
कमनज़र समेटता है, कम्बल, गद्दे, रजाईयां,
और जैसी भी गरमी की बिखरी परछाईयां,
रात में अलाव की लकडियों के लिए,
जंगल में और नहीं लौटना चाहता,
लील न ले कहीं,
कोई पुराना ठंडा कुआं ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
आड़ी, टेढ़ी, जलेबी लकीरों में खींचता है,
नियति, सम्बन्ध और बाज़ार की संभावनाओं के बीच,
सफ़ेद, बुर्राक़ और प्रकाश का अन्तर,
खनखनाते नसीब और खखारती आत्मा के पशोपेश में,
जो नहीं देखना है उसे परदे के पीछे,
या मुठ्ठी के भींचे अन्दर,
या रोशनी की पीठ के गुच्छे तारों में,
या हाशिये और प्रवाह के एकसाथ समानांतर,
खेलता है,
चाव से लतों में फेंट कर,
साँप, सीढ़ी और जुआ ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
धीरे-धीरे छोड़ता है, असबाब, माल-टाल,
फरुआ, हल, तसला, असलहा, चैन, गैंती, रेगमाल,
फिर भी
जुतने और जोतने के दोधारी अस्तित्व में अभी तक वर्तमान,
एक गंडा भर बांधे है श्रीयुक्त श्रीमान,
कुछ स्वस्थ कुछ थकेहाल,
ताबीज़ भरे है हंस के पंख, लोमड़, गैंडे और बाघ के बाल,
हाल चाल/ में सधे चेहरे जानता चिन्हाता है,
गउओं, कउओं, गिद्धों, गिरगिटों में बतंगड़ बनाता है,
(और कान के पीछे काला टीका अब नहीं लगवाता है)
तीन सौ दो, चार सौ बीस को गिनती नहीं मानता,
खिड़कियों पर सलाखें, जंगले, मोटी जालियां लगवाता, ठोंकता,
सजाता है द्वार पर,
संटी वाला पहरुआ।

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
पता नहीं, मौका तलाश रहा है,
पता नहीं ज़िंदा है या अवकाश रहा है,
पता नहीं कर्तव्य के निर्वाह में है,
या बेचैन आरामगाह में है,
यह भी पता नहीं कभी,
उसकी आंखों के कोनों से टहल गया अतिरेक
विदा का था या मुक्ति का,
प्रश्न भूले बिसरे हुलसता है, कभी एक,
अभी भी समझ में नहीं आता है,
उन्माद का सृजन,
पुरवा था या पछुआ?

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
भूल से भूल लिखता हुआ,
वो तो जा चुका, निकल गया,
क्या था? कहाँ, किसका हुआ?

21 comments:

अभिनव said...

वाह वाह, बहुत बढ़िया शब्द चित्र..

sidheshwer said...

बाजार की माया
और
बाजार से गुजरा हू, खरीददार नहीं हूं
यह तो मिर्च है दद्दा-हरी मिर्च

Udan Tashtari said...

वाह, क्या बात है. बहुत उम्दा, बधाई.

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया...

जीना सीख रहे हैं इस 'बाज़ारियत' का जीवन....और सीखना कभी ख़त्म नहीं होगा.

राज भाटिय़ा said...

यह जिन्दगी भी तो एक ऎसा बाजार हे जहा हम भागे जा रहे हे, वाह कया भाव हे बहुर सुन्दर. धन्यवाद

चंद्रभूषण said...

यूं...आया बाजार में
वूं...चलता चला गया
बहो..त, बहो..त दूर
लं...बी दौड़ का कछुआ।

रजनी भार्गव said...

क्या कहने,आप श्ब्दों और भावों दोनों के धनी हैं.

Pramod Singh said...

हूं. बड़ी उलझी झांकी बुनी, मित्र..

Sandeep Singh said...

बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ,
धीरे-धीरे छोड़ता है, असबाब, माल-टाल,
फरुआ, हल, तसला, असलहा, चैन, गैंती, रेगमाल,
फिर भी
जुतने और जोतने के दोधारी अस्तित्व में अभी तक वर्तमान,
एक गंडा भर बांधे है श्रीयुक्त श्रीमान,
कुछ स्वस्थ कुछ थकेहाल..........

हाह हाह आह हांफ गया लगा मुक्तिबोध से टकरा गया। बहुत अच्छा।

शिरीष कुमार मौर्य said...

जोशिम जी आज आपका ब्लाग देखा!
अपने ब्लाग मे लिन्क दे रहा हु !

अभिषेक ओझा said...

जोशीजी आपके ब्लॉग पर तो मैं नियमित रूप से आता रहा हूँ, पर आज ही पता चला की आप IITK से जुड़े हुए हैं. जी हाँ आपका अनुमान सही है... नीरज मिश्रा सर Stats पढाते हैं. उन्होंने हमें भी पढाया है. खेलो में उनकी रूचि अभी भी है.... और वो Games Counselor भी थे. उनके पुत्र भी अब badminton खेलने आया करते हैं. उनके बारे में आप यहाँ देख सकते हैं: http://home.iitk.ac.in/~neeraj/ और ये जोशिम नाम कहीं IIT में ही तो नहीं मिला था आपको?

विशाल श्रीवास्तव said...

अपने ब्लाग पर आपका कमेंट देखा ...
अच्छा लगा
बन्धु कविता आपने जोरदार लिख्री है

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

बहुत बढ़िया भाव.. क्या खूब बात कही है आपने..

Renu said...

Wah Mickey, bahut achhi lagi yeh kavita bhi, har baar ki tarah !!

हर्षवर्धन said...

जय बाजार

DR.ANURAG ARYA said...

kamal hai lagta hai ,ek hi baithak me likhi hai aapne.

DR.ANURAG ARYA said...

pichle kai dino se jab bhi aapka chittha kholta,ek hi kavita dikha raha tha ,mai soch me pad gaya ki manish bhai likh kyu nahi rahe hai?aaj gaur se dekha to aapka choutha ya panchva panna hi khul raha tha bar bar..neeche jakar newer post ka batan dabaya tab rahsya khula kidekhiye unhone to kitni dhansoo kavita likh rakhi hai....

RA said...

कवि महोदय, शब्द आपके चितेरे हैं: बहुत कुछ कह जाते हैं, पाठक को घुमाते फिराते है, स्वप्न और यथार्थ दोनो जगह की यात्रा पर लिये जाते हैं। अभिनव और संदीप सिहं के अनुसार: चित्र और मुक्तिबोध का असर सा भी दिखाते हैं।
कविता खू़ब और टिप्पणियाँ भी सटीक हैं।

रवीन्द्र प्रभात said...

बाज़ार के बारे में विस्तार से जानकर अच्छा लगा !वह भी शब्द चित्र के माध्यम से ,बहुत बढ़िया शब्द चित्र, बधाईयाँ !

swati said...

बहुत सजीव --- सुंदर

आस्तीन का अजगर said...

सिर्फ़ विंडोशॉपिंग काफ़ी नहीं है कामरेड. बहुत दिनों पहले पढ़ा आक्तोवियो पाज़ का लेख याद आया - पोएट इन द मार्केट प्लेस. एक नई सतह पर आपको देख अच्छा लग रहा है. शायद ऐसे ही शिल्प को तोड़कर शब्द बहते हैं अपने अर्थ तक. कई बार झोला लेकर साइकिल पर बाज़ार जाता हूँ, तो लगता है कि अपने पूर्वजों का रिचुअल दोहरा रहा हूँ.