क्या अभी भी बैठे हैं वहाँ
सपने देखने वाले
चिड़िया की कलगी पर
चीड़ों की फुनगी पर
देखते हैं आभा के रक्तिम
जहाँ दीखते हैं गहरे से काले
लौटने वाले
साए लंबे होते हैं छाया से प्रेत
गर्म हवाएं
देस के भेस लौटती आशाएं
बरसात की बाती उम्मीदें जिनपे गहन बिके खेत
भाषाओं से खारे समवेत
रेत की शहतीरें, रेलम पेल के मर्ज़
जमा खर्च कुछ चुकाए/ अनचुके ज़मीनी क़र्ज़
गिरहबान में छले छाले
दर्ज़ है तारीख में
खोये पाए हिसाब के हवाले
अस्तव्यस्त
डब्बे चित्रपटों में बदलते दुनियावी
दुविधा की सुविधा के बेशकीमती मरहम
द्रुत गति की सुर्खियों में छींकते महानतम
आदतन बाँटते हैं झोल दिलासाएं
गुफाएं, सुरंगें, कंदराएं
पेट को जोड़ने हाथ से काटने के उपक्रम
कहाँ जाएं - झूठ में या जूठे सच में
हैं लस्तपस्त
लम्बी चढ़ाई के पहिये
चरमराये सम्भव असंभव को कूदने फांदने वाले
ऐसे में फ़िलहाल
चुप की ज़मीन चुपके से
दिग्भ्रमित आसमानों पर रोई है
आराम के मकानों की राह
इत्मीनानों से मुड़ के
बहरहाल
बलुआ धसानों में खोई है
गिनती की सूखी उँगलियों में
कितने बुत पत्ते हैं बन टूटने वाले
बस इस बरस के बसंत
बरसे हैं पतझड़ के पतनाले
आत्मीय सर्वनाम
संज्ञा शून्य तागों में
लटके स्मृतियों के चले वर्ष
चौंकते चटखते विषाद को
उल्लास में ढूंढते ढले उत्कर्ष
पकड़ से निकलते जकड़ी आखों से पकड़ते
संघर्ष से परिणाम
परिजनों से पत्र
काढ़े संवाद की रेखाओं के दुखड़े वक्र
समय चक्र में गड्डमगड्ड सरे आम
जाले ही जाले
ज्यों हर लड़ाई के हारे नाम
जीते हैं हरिनाम के सम्हाले
अनवरत
वैसे ही कटते हैं सुख जैसे
दुःख ढक जाते हैं
भय के ताबूत भरे दिन
दबे पाँव पक जाते हैं
आहटों को टोहते
प्रभाहत
ठिकानों में
चाभियाँ भी उनकी हैं उन्हीं के हैं ताले
धूप छांव में
यूं ही बैठे हैं सपनों में अपनों में देखने वाले
Feb 26, 2009
प्रभाहत
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16 comments:
बहुत दिनोँ के बाद आपका लिखा पढा और शीर्षक ही इतना नया लगा कि पूरी कविता एक साँस मेँ पढी और बहुत पसँद आई !
- लावण्या
इसे पढ़ो मतलब कि बस पढ़ते रहो। कविता से आगे की कविता।
ऐसे में फ़िलहाल
चुप की ज़मीन चुपके से
दिग्भ्रमित आसमानों पर रोई है
आराम के मकानों की राह
इत्मीनानों से मुड़ के
बहरहाल
बलुआ धसानों में खोई है
गिनती की सूखी उँगलियों में
कितने बुत पत्ते हैं बन टूटने वाले
बस इस बरस के बसंत
बरसे हैं पतझड़ के पतनाले
अद्भुत शब्द .जानी पहचानी उसी कलम से निकले ..आमद सुखद है मनीष भाई ......आपकी कविता ने बहुत कुछ पिरो दिया है .
बहुत ही बेहतरीन रचना है।बधाई स्वीकारें।
प्रभु अब आपकी कविता के बारे में क्या लिखें? कमाल की होती हैं...बेमिसाल होती हैं...पहले भी थीं आज भी हैं...लेकिन ये बताएं की जनाब इतने दिनों थे कहाँ...कोई खोज खबर नहीं...भाई इतना लम्बा मौन मत रखा करो...अब आये तो फिर से चले मत जाना...ये ही गुजारिश है...
नीरज
क्या भैया, हरी मिर्च मौसमानुसार आती है क्या?
सयानी सी बातें...
याद क्यों नहीं आती आपको अक्सर अपने
पाठकों की ?
पुरे ६ महीने १० दिन बाद !
bahut dino tak smpark se kate rhe aap isliye kavita padhne se pahle gussa jahir karna jaruri hai...kjhsdddskjdfifpwoierpowf (ye line gusse wali thi...bach gaye hindi fond nahi hai...ab kavita padhne ja raha hoon)
डब्बे चित्रपटों में बदलते दुनियावी
दुविधा की सुविधा के बेशकीमती मरहम
... उम्दा है
Anand aa gaya bandhu!! Hindi font nahin hai.. isliye kshama chahta hoon ki angrezi ke aksharon mein likh raha hooh.
बहुत बढिया ...
वैसे ही कटते हैं सुख जैसे
दुःख ढक जाते हैं
भय के ताबूत भरे दिन
दबे पाँव पक जाते हैं...
...मनीष जी हौसले वाले हैं आप।
read and cant get enough.
joshim jee apki rachnayein hume kafi achi lagi hain...apke blog ka jikra humne apne blog kiya hai apki ijajat ke bina...
agar gustakhi lage to hume jaroor ittla kare...hume use hata lenge...
मनीष जी, नमस्कार।
कैसे हैं। इधर लगभग दो साल से मैं ब्लॉग की दुनिया से बिलकुल दूर ही थी। इसलिए इधर की हलचलों की कुछ खबर ही नहीं थी। लेकिन अब जब फिर थोड़ा सा सक्रिय हुई हूं तो आप कहीं नजर नहीं आए। आपके ब्लॉग पर भी बहुत पुराना कुछ दिख रहा है।
सब खैरियत तो है ना।
आपका मेल आई डी मुझे पता नहीं इसलिए ब्लॉग के कमेंकमें बॉक्स में जाकर लिख रही हूं। आपको मिले तो अपना मेल आईडी भी मुझे भेज दीजिए।
मनीषा
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