Mar 25, 2010

वो जो बस नहीं है देह में ....

..यहीं कहीं है, रहेगा यहीं कहीं स्मृतियों के अवलेह में..

कार्तिक (२ जून २००४- २४ मार्च २००९) के लिए




ओ रे तारे,  जहां दूर जाना ज़रा,  
सारे तारे-जहां घूम आना ज़रा
दूर से ही वहीं, टिमटिमाना ज़रा,
ओ किरन की कनी, यूं दिखाना ज़रा



वो खुशी आंख से मिल खुली चुल्बुली,
चाहे जैसी   कसी   जिंदगी से मिली
हर कली मुश्मुशी, छांट लेना खिली,
मुस्कुराहट वही खिलखिलाना ज़रा







शब्द बौने, खिलौने, दवाएं- दुआ,
लाड़, मनुहार, सोना छुआ जो हुआ
ना हुआ इस जहां में जहां का हुआ,
वैसी दुनिया से दुनिया बढ़ाना ज़रा








कहते हैं, बिन दुखों का वो विस्तार है,
जहां से यहां अंत का द्वार है
पार संसार , ज़्यादा सी चमके खुशी
कष्ट कम हों, हो बेहतर ज़माना ज़रा 






क्या करें है अकेला तेरा ये सफ़र,
बस तेरा हौसला हम इधर ना उधर
भर के मन से लगाना नया जो मिले,
याद आने की हद याद आना ज़रा










खुद-ब-खुद ना सही याद आना यूंहीं,
खो न पाना पुराना नए में कहीं
ढूंढ लेंगे किसी दिन वो तारे-ज़मीं,
उस जहां में ठिकाना बताना ज़रा






ओ रे तारे..




http://www.youtube.com/watch?v=eL5CZfYeE-o
Post a Comment