Nov 17, 2007

प्रथम

मेरे सहमे कदम, दरवाज़े तक टहलते, ठहरे
अभी भी दस्तक की दहलीज़ थमे, हिचके इकहरे
मरोड़ता रहा हथेली के मुहाने,
अभी वक्त को शुरू होना हैं
इस बार कलम को नहीं उँगलियों को सहेजना है
.....शायद
Post a Comment