Nov 26, 2007

अधेड़

.....

इस बार बैठे ख्यालों में रंग नमकीन नहीं
मेरी शोहरत के बवालों में, संग दूरबीन नहीं

पास की नज़र में, लग लगा काला टीका
उम्र रौनक की सही, पर इतनी बेहतरीन नहीं

पैर बिवाईयों के जोर ही चलें, ओस की सरहद
नाक के नुक्कड़ की किस्मत, तमाशाबीन नहीं

शोर कितना करे ये जोश, मगज मारी के चले
जुबां की चुप पे सगे गोश्त की संगीन नहीं

आज इरादे को मेरा जिस्म सोख ले कैसे
जिस पसीने में तेरी सोच नाज़नीन नहीं

सबर मालिक, के नींद अभी बाकी है यहाँ
ये खबर के अजगर की रूमानी आस्तीन नहीं

आज अभी दिल नहीं दो उँगलियाँ उठाने का
वरना इस सोच की आज - अभी आमीन नहीं

...
इस बार बैठे ख्यालों में रंग नमकीन नहीं
मेरी शोहरत के बवालों में, संग दूरबीन नहीं
Post a Comment