May 9, 2010

अल्ज़्हाईमर

... ये मां के लिए, जो जाने कितने सालों से, बेनागा रोज सप्तशती कवच के पाठ को ही पूजा मानती थी.....इदं फलं मयादेवी स्थापितं पुरतस्तव, तेन मे सफलावाप्तिर्भवेत् जन्मनिजन्मनि.....– गए दो तीन सालों में इस बीमारी ने धीरे धीरे घुस पैठे स्मृति हुनर विवेक शब्द अर्थ सब हरे हैं, मां ने ब आस्था ..इदं फलं.. को नहीं छोड़ा है – हर सन्दर्भ में, व्याख्या में वाक्य, वार्ता में, कारण में, सबके कल्पनाशील निवारण में, तकियाकलाम ..इदं फलं..
....शायद यह भी कि ये कविता तथाकथित आनुवांशिक संभावनाओं के होने न होने के अपने भय के लिए भी है, तथाव्यथित होने से पहले.....  वैसे मां और बच्चों में फर्क क्या है....

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नोक से भी नुकीला
अन्धकार के पहले चमकता चमकीला अन्धकार
समुद्र के नीचे का एक और गहरा सम उग्र
और आकाश से सुदूर एक और क्षितिज आकाश अपार
दृष्टि पटल की सातवीं तह के परदे कुहासे के पार
कितने मन द्वार हैं अभेद्य, कितने अनुनाद सुप्ताकार.
भागफल के असामान्य अंधकूप
कोशिकाओं की कोशिकाओं के अणुओं परमाणुओं के वर्ग मूल रूप
संचित जमा हुआ भय - भयंकर भय अपरम्पार
जलधि का भय,
तड़ित का भय,
विदेह का भय,
इति वैश्वानर का भय,
उभरता दबे पाँव घुसपैठी गुत्थियों गलतियों घुस भरा भय
शनैः शनैः घड़ियों के समय के पार का समय
एक दिन आकंठ आएगा
इदं फलं – क्या ऐसा ही हो जाएगा?

ऐसे ही स्मृति वर्षा से हीन दीन दिनों में मैं कातर
ढूंढूंगा चित्रों में रेखाएं, गंध में सौरभ, आगतों में स्नेह
और स्नेह में संशय और संदेह में स्वागत झलक भर
परिकल्पना के कुटिल यथार्थ पर
खड़िया से चूरे सफ़ेद झरेंगे परम हंस झर झर
जटिल मटमैली लकीरें भाप साए
कितने पराए अपने, अपने कितने पराए
अजनबी बारहखड़ी लेखनी हस्ताक्षर
अगूंठा बन जाऊँगा कागज़ी कार्यवाईयों पर
बालसुलभ,
शायद हंसने की कोशिश की कोशिश में हंसकर
कोशिश जैसे कि बना रहे कुछ सम बंध,
संबंधों के इर्द गिर्द
कटती जाली से आती रहे नरम हवा सांस भर
कोशिश में कठिन टटोलूंगा
गिनतियाँ भूलने से पहले का स्खलित हिसाब
स्मृतियों से चूकते प्रसंगों में शेष स्वयं
कः कालः, काणि मित्राणि, को देशम्, कथं निगम

विचलित संवादों की परिधि के पूर्णाश्रय में
कौन सनद पाएगा,
दैनन्दिनी की त्रिज्या में
अनुभव का बीता तह तह, बह कर कपूर जाएगा
कलकल के पल, श्रम अनुक्रम संघर्ष अनन्य तम
शोणित के तीत, रोज़मर्रा के मीत,
जीविका और उपार्जन के किस्से पराक्रम
अतीत का व्यतीत निर्झर अंततः शुष्क शीत जाएगा
निर्मम है आज अभी कहना कुतरे जाने से पहले
दबे सुरों से, पहले घेर ले प्रारब्ध अधम
सर्वदा सदा नहीं रहा था
अन्यमनस्क , कर्तव्यविमूढ़-किं, असुगम

पार संस्कार के बंद तहखाने से खुले नक्षत्रों से आदोलित
इहलोक के स्नायुओं का टूटता दरकता पदचाप
लौटाव का तद्भव वार्तालाप
अस्थिर अटपट गजबज कथावाचित
परावर्तित आमूल शूल
मैं यह भी भूल जाऊंगा
अस्थियों में छुपा है वज्र मूल

स्व अवशेष स्वतः
अस्ति कश्चित वाग्विशेषः?
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