Oct 21, 2010

नापचबना

सफर में हो?...

सफर में हो? कहाँ हो?  और कैसे?  यार बाजीमार,
तनिक फुर्सत तो आओ, बैठ लें, हो बात दो से चार.


अमां हो किस जहां?  वैसे ही क्या  धुनधार करते हो?
सरचढ़ी गड़बड़ी,  धड़  फक्कड़ी   लठमार करते हो?
मजलिस है मियाँ वैसी, कि बैठक है अलग इस बार?
सुनते हो   किसी  की,  या खुदी  दरकार करते  हो?

नुक्ता मत पकड़ना, गलतियां तो, और भी भरमार,
बढ़ती जा रहीं  जस  उम्र,  तस  सर  बाल चांदी तार.


कहाँ रिक्शे के पट्टे, आध दर्जन साथ लद फद कर,
गए अर्जन को क्या-क्या, नील छापे झूलते स्वेटर,
वो सरगम पाठ, लंबी डांठ, छोटी छुट्टियों के  ठाठ,
दबी जो बीच उंगली चाक, फटे फट हाथ पर डस्टर.

वो पट्टी टाट की, गर्दों में लिपटी  बहस गुत्थामार,
जुमेंरातों को लगते दिन शुरू के, खास मंगल वार.


लड़ाकू था जो इक बिन बात, बोलो क्या हुआ उसका
औ दो जो हांकता था हर जगह, वो ठसक का फुसका
चार  चिरकुट,  जिन्हें  तुम पीठ पीछे  चढ़ चिढ़ाते थे
कई वो भी,  नमक के गीत  गाने  का  जिन्हें  चस्का

वही  जन  डार  से  बिसरे, कला के कूट छापामार,
बया  के   घोंसले,   तन  फूल-पत्ती,  बेल  बूटेदार.


सुना  घोंघा   बसंतों में  विवाह-ए-प्रेम कर ऐंठा,
उड़ा   दांतू  जहाजों  से   फिरंगी  देस   जा  बैठा,
पढ़ाकू  कड़क  फौजी है  तो मौजी है  दुकानों में,
वो तेली  सूट बूटों  में,   बैदकी  में   नगर  सेठा.

कहो ना  राम दे!  सोचा नहीं  वैसे  हुए  शाहकार,
काम से कलम बनना था दाम ले हो गए तलवार.


ये क्या कहते हो  जानी  धुंधलके की सी कहानी है,
गई  वो  याद  मास्टर  साब  कहते  गुरबखानी  है,
कि काली डायरी भी तुमसे पूछे नाम क्या लिखना,
वजह की आयतों में किस जगह  बिंदी  लगानी है.

हाँ माना व्यस्त हो, सो सटकते भूतों से ये व्यवहार,
उम्मीदों की हरारत  जी  बही  खातों  से है ज्योनार.


अपन  का क्या,  अपन  ढर्रे में  ढल जाएँ प्यादे हैं,
लगे  चमचम के शीरे  में, मगर मिर्चों में ज्यादे हैं,
चक्कर-बात,   झंझावात   आते   हैं    हिलाते   हैं,
अपन  जड़ हैं  तो मन  के  जोड़ पर  धागे इरादे हैं.

बचपन से गए नप-चब गए,  हालात बन इसरार,
चांदमारी ये कुदरत की, सेंत में बन गए अशआर.


अरे हाँ सुन लिया, कहते हो ऐसे अब नहीं लिखते,
नई फसलों के मौसम हैं, कहन के हैं अलग रस्ते,
हमी टेढ़े के टेढ़े दुम  दिनों  क्या  साल  नलकों में,
रही  ढपली  पुरानी  राग  ताजे  जब  नहीं  बजते.

बनी बंसी से बासी सुर निकलते आ रहे इस पार,
जो दब लेंगे तो बदलेंगे, बदी नेकी के ऐ सरकार.


अजी कितना बदल कर आज भी कितना नहीं बदला,
मुखौटे   नाम   बदले   खेल   वैसा  दलबदल  घपला,
मुलुक की बत्तियाँ  पतली,  मोटक्के धर्म साए दिन,
अभी भी  रात  बहते  कौंधती  केवल  सफल  चपला.

ढही फितरत, रही मेहनत, सही दरबार के सहकार,
नहीं फुर्सत तो साथी मेट जाना  इस दिशा के द्वार

सफर में हो?...

9 comments:

RA said...

Love this one.

नुक्ता मत पकड़ना, गलतियां तो, और भी भरमार,
बढ़ती जा रहीं जस उम्र, तस सर बाल चांदी तार.

वाह !

PADMSINGH said...

कहानी छेड़ दी माज़ी की कश्ती छोड़ दी मजधार
बड़ी मुश्किल से खे कर ले गए थे याद के उस पार
.......सब कुछ उमड़ घुमड़ कर ताज़ा हो उठा .......जाने कहाँ गए वो दिन ...
खूबसूरत अशआर ...

प्रवीण पाण्डेय said...

दमदार धौंकनी, तृप्ति मिली पढ़कर।

मुनीश ( munish ) said...

Worth recommending to NCERT for countrywide Hindi text books .This kind of a fresh burst of energy coupled with sweetly painful nostalgia is rare in Hindi poetry .

डॉ .अनुराग said...

only you can writhe this kind .....

khas aapka style....

Arun Aditya said...

adbhut...adbhut!

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत खूब...

आपकी रचना से आपके लिए:

अमां हो किस जहां?

पारूल said...

बेहतरीन कह रही हूँ -- कई - कई बार

sangeeta said...

This is excellent poetry . Enjoyed reading and it's been a long time when i read something like this.

I am glad i stumbled at this blog.