Oct 10, 2010

गुज़रते बादल

जाने  वो जब भी  समन्दर से गुज़रते होंगे
डूब कर खुद-ब-खुद अन्दर से गुज़रते होंगे

उनकी देखी हुई दुनिया वैसी दुनिया है जहाँ
बरसते होंगे जहां जिस बहर से गुज़रते होंगे

दरबदर आस के दरो दर के रिसाले से कहीं
चलते चाकों में  घन  ठहर से  गुज़रते होंगे

ऐसा  सुन पाए नहीं  उफ़ या आह बहते हों
खबर मालूम थी वो नश्तर से गुज़रते होंगे

सुना आँखों की हँसी बातों से न दूरी थी
पास कितने जी   बवंडर से गुज़रते होंगे

कभी चट्टान पे खिली धूप को खुलकर देखो
वो  उस बहार के   कोहबर  से  गुज़रते होंगे

गुज़रते बादल किसी के हुए न हुए सबके हुए
चाहे  खुद हों न हों   नम घर से गुज़रते होंगे
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