Jun 10, 2011

लयकतरा

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आदत बहले, मत बदले, हौले हौले सहलाने वाले,
चंद मंद रंगवाने वाले, गीत लौट कर जाने वाले.

सूना मान मिला कर जूना,
सावन घर में छप्पर चूना,
बदर बदरिया बरस बुरादा,
खोखर भरे काठ में दूना.

बिन बारिश का भरा समन्दर,
पथरीला तट बाहर अंदर,
बहुरि भरें मरू का गोवर्धन,
उंगली हाथ नचाने वाले .

मूसल का आधार बना कर, कूट पिसान पिसाने वाले,
बन घन सुर में आएं गाएं, असली के बरसाने वाले.

मन क्या करता नहीं तुम्हारा,
पुलक पुराना मिले दुबारा,
झलक दिखाकर ओझल होता,
पलक झपकते ख्वाब इशारा.

तन्मयता का नशा खुमारी,
रहा रहेगा, बात लबारी,
सुनते स्वर में रही गनीमत,
निशमन नयन निभाने वाले.

झंकारों में ताल ठोंक कर, तार बिरंगे ताने वाले,
निंदिया से कुछ ले भी आएं, सपन सुनहरे बाने वाले.

मुक्त युक्त की बेधुन लय है,
गुप्त लहर बंधन संशय है,
अमिय कहो उच्श्रृंखल हाला,
तृप्ति विजन ऊबड़ आलय है.

कहते कहते रह जाने में,
याद मंत्र के सह धाने में,
पुर का पहना कहाँ उतारें,
गाम धाम मन माने वाले.

बुद-बुद फूट पड़े आते हैं, भाव पुराने भाने वाले,
छुट्टे छंद बंद होठों को, सदा नहीं सिलवाने वाले.

कथा नाम के पद्य अबाधा,
जिनका होना सीधा साधा,
वज्र कठिन साधन संधाना,
यथा विधा को पाना आधा.

इतनी सारी आवृतियां जो,
कृतियों में कृतियाँ उठतीं गो,
क्लिष्ट कला की बूझ समझ में,
छाया मृग पकड़ाने वाले.

धर प्रयोग की पकड़ जकड़ में, अपने राम पुराने वाले,
जैसे घड़ा भरे जिस दिन, उस जल की धार बहाने वाले.

[पु. – वैसे अपने राम के बारे में ये भी कह सकते हैं कि – “भगवा सगवा नहीं पहनते, मर्यादा रह जाने वाले” -मिर्च ज्यादा हो जाती है ]
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