Jun 19, 2011

जि.. जी.. विषा

[.......]

जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है.

बलाएं भी बिरादर इस तरह, संग राह है प्यारे,
पनाहों में पता चलता, कहर पहले से आए हैं.

उन्हें रातों के बारे में, खुदा मालूम कुछ ना हो,
जिन्हें लगती मुसीबत है, वो कैसे दिन बिताए हैं.

अभी दिखता नहीं नासूर, काँटा है हिजाबों में,
गए वो अक्स अक्सर, आईनों में चिरमिराए हैं.

इन्हीं हालात से, नाज़ुक बने हैं हाल इस माफिक,
कहीं छोटे से छोटे शब्द, बढ़ कर दिल चुभाए हैं

बुरा ना मानना, उनको लगेगा वक़्त चलने में,
जो पिछले पाँव छालों के, चकत्ते काट लाए हैं.

वो वैसे हों न हों, जीवन उन्हें गुलज़ार रख लेगा,
यही दुनिया है, ज़िम्मेवारियां बरगद के साए हैं.

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

51 comments:

Udan Tashtari said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

-वाह, बहुत उम्दा!!

प्रवीण पाण्डेय said...

जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है.

बहुत ही सुन्दर।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

बहुत खूबसूरत गज़ल

पारुल "पुखराज" said...

यही दुनिया है, ज़िम्मेवारियां बरगद के साए हैं.

यही दुनिया है, ज़िम्मेवारियां बरगद के साए हैं.....

Rangnath Singh said...

गजल बढ़िया उतरी है। बधाई।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 21 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच-- 51 ..चर्चा मंच

वाणी गीत said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

बेहद खूबसूरत !

Anil Avtaar said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

बहुत ही खूबसूरत !

prerna argal said...

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.
bahut sunder bemisaal gajal.bahut badhaai aapko .



please visit my blog.thanks.

दिगम्बर नासवा said...

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं ...

आज तो जोशी जी पहुँच गए हम भी आपके ब्लॉग ... उस दिन की मुलाक़ात और आपकी रचनाओं का स्वाद ... दोनों का नशा उतर नहीं पाया है अभी तक ... उस पर करोके का इन्तेज़ार ...
आशा है जल्दी ही मुलाक़ात होगी ...

shikha varshney said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

बहुत ही बढ़िया.

सदा said...

कभी लेकिन अचानक आप बहता है, हुआ यूं क्यूं,
पलक भर पोंछ ले वो फिर, पलट कर मुस्कुराए हैं

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

वाह .. बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

अनामिका की सदायें ...... said...

bar bad padhne ko dil kiya is gazel ko.

har sher laajawab. umda gazal.

प्रवीण कुमार दुबे said...

आपका ब्लॉग पसंद आया....
कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

amrendra "amar" said...

बहुत खूबसूरत गज़ल

vermatr said...

dukho ke sath jine ka maja kuch aaur hota hai,isi ki rah se insan manzil tak pahunchtey hain|




tuka ram verma

Anonymous said...

i am very impressed with ur blog. please kindly add my one of my newly created blogs as below:

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Sandeep Singh said...

इस बीच बस ऑफिस का होकर रह गया हूं...कम्बखतों ने निजता का कोई कोना नहीं छोड़ा...खुद लिखने की मोहलत तो फिलहाल मिलती नहीं या कहें क्षमता ही नहीं रही लेकिन टिपियाने पर भी लगता है पाबंदी लगा दी है कई बार कोशिश की लेकिन ऑफिस में बैठे ऐसा संभव नहीं हो सका और घर लौटकर 'जिजीविषा' के संघर्ष का वक्त भी कम नजर आता है...लेकिन आप काबिले तारीफ है क्योंकि जि..जी..विषा के संघर्ष तले भी आपने सहन की नींव खुद के लिए ही नहीं संवेदनशील साथियों के लिए भी बचाकर रखी है...दुआ यही कि आपके शब्दों की सीमेंट कभी न सीले:)
सचमुच पूरी गजल बिलकुल ताजी औऱ बहुत अच्छी लगी।

एम के मिश्र said...

Bahut bada jhola chahiye thok me saman lane ke liye. Khuda ka Shultz Ada karo bhai.

Akshat said...

बहुत ही खूबसूरत प्रस्‍तुति है !

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, said...

bahut hi sundar manmohak gazal dil ko chuta hai hai sher khaskar akele agar.......

आड़ी टेढी सी जिंदगी said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

ये पंक्तियाँ छू गयीं...अपनी फेसबुक वाल पे शेयर कर रहा हूँ....

shresth said...

लाजबाव,उमदा और दिल को छु लेने वाला...बहुत ही अच्छा...

Vaneet Nagpal said...

मनीष जोशी जी ,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगसपाट डाट काम" के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बढ़िया रचना |

कृपया मेरी भी रचना देखें और ब्लॉग अच्छा लगे तो फोलो करें |
सुनो ऐ सरकार !!
और इस नए ब्लॉग पे भी आयें और फोलो करें |
काव्य का संसार

DR.MANISH KUMAR MISHRA said...

प्रिय हिंदी ब्लॉगर बंधुओं ,
आप को सूचित करते हुवे हर्ष हो रहा है क़ि आगामी शैक्षणिक वर्ष २०११-२०१२ के दिसम्बर माह में ०९--१० दिसम्बर (शुक्रवार -शनिवार ) को ''हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' इस विषय पर दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है. विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संगोष्ठी को संपोषित किया जा सके इस सन्दर्भ में औपचारिकतायें पूरी की जा चुकी हैं. के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजन की जिम्मेदारी ली गयी है. महाविद्यालय के प्रबन्धन समिति ने संभावित संगोष्ठी के पूरे खर्च को उठाने की जिम्मेदारी ली है. यदि किसी कारणवश कतिपय संस्थानों से आर्थिक मदद नहीं मिल पाई तो भी यह आयोजन महाविद्यालय अपने खर्च पर करेगा.

संगोष्ठी की तारीख भी निश्चित हो गई है (०९ -१० दिसम्बर२०११ ) संगोष्ठी में आप की सक्रीय सहभागिता जरूरी है. दरअसल संगोष्ठी के दिन उदघाटन समारोह में हिंदी ब्लागगिंग पर एक पुस्तक के लोकार्पण क़ी योजना भी है. आप लोगों द्वारा भेजे गए आलेखों को ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जायेगा . आप सभी से अनुरोध है क़ि आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें . आलेख भेजने की अंतिम तारीख २५ सितम्बर २०११ है. मूल विषय है-''हिंदी ब्लागिंग: स्वरूप,व्याप्ति और संभावनाएं ''
आप इस मूल विषय से जुड़कर अपनी सुविधा के अनुसार उप विषय चुन सकते हैं

जैसे क़ि ----------------
१- हिंदी ब्लागिंग का इतिहास

२- हिंदी ब्लागिंग का प्रारंभिक स्वरूप

३- हिंदी ब्लागिंग और तकनीकी समस्याएँ
४-हिंदी ब्लागिंग और हिंदी साहित्य

५-हिंदी के प्रचार -प्रसार में हिंदी ब्लागिंग का योगदान

६-हिंदी अध्ययन -अध्यापन में ब्लागिंग क़ी उपयोगिता

७- हिंदी टंकण : समस्याएँ और निराकरण
८-हिंदी ब्लागिंग का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य

९-हिंदी के साहित्यिक ब्लॉग
१०-विज्ञानं और प्रोद्योगिकी से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

११- स्त्री विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

१२-आदिवासी विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

१३-दलित विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
१४- मीडिया और समाचारों से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
१५- हिंदी ब्लागिंग के माध्यम से धनोपार्जन

१६-हिंदी ब्लागिंग से जुड़ने के तरीके
१७-हिंदी ब्लागिंग का वर्तमान परिदृश्य
१८- हिंदी ब्लागिंग का भविष्य

१९-हिंदी के श्रेष्ठ ब्लागर

२०-हिंदी तर विषयों से हिंदी ब्लागिंग का सम्बन्ध
२१- विभिन्न साहित्यिक विधाओं से सम्बंधित हिंदी ब्लाग
२२- हिंदी ब्लागिंग में सहायक तकनीकें
२३- हिंदी ब्लागिंग और कॉपी राइट कानून

२४- हिंदी ब्लागिंग और आलोचना
२५-हिंदी ब्लागिंग और साइबर ला
२६-हिंदी ब्लागिंग और आचार संहिता का प्रश्न
२७-हिंदी ब्लागिंग के लिए निर्धारित मूल्यों क़ी आवश्यकता
२८-हिंदी और भारतीय भाषाओं में ब्लागिंग का तुलनात्मक अध्ययन
२९-अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी ब्लागिंग क़ी वर्तमान स्थिति

३०-हिंदी साहित्य और भाषा पर ब्लागिंग का प्रभाव

३१- हिंदी ब्लागिंग के माध्यम से रोजगार क़ी संभावनाएं
३२- हिंदी ब्लागिंग से सम्बंधित गजेट /स्वाफ्ट वयेर


३३- हिंदी ब्लाग्स पर उपलब्ध जानकारी कितनी विश्वसनीय ?

३४-हिंदी ब्लागिंग : एक प्रोद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा

३५- डायरी विधा बनाम हिंदी ब्लागिंग

३६-हिंदी ब्लागिंग और व्यक्तिगत पत्रकारिता

३७-वेब पत्रकारिता में हिंदी ब्लागिंग का स्थान

३८- पत्रकारिता और ब्लागिंग का सम्बन्ध
३९- क्या ब्लागिंग को साहित्यिक विधा माना जा सकता है ?
४०-सामाजिक सरोकारों से जुड़े हिंदी ब्लाग

४१-हिंदी ब्लागिंग और प्रवासी भारतीय


आप सभी के सहयोग क़ी आवश्यकता है . अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें



डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
हिंदी विभाग के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय

गांधारी विलेज , पडघा रोड
कल्याण -पश्चिम, ,जिला-ठाणे
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महाराष्ट्र
mo-09324790726
manishmuntazir@gmail.com
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रविकर said...

साढ़े छह सौ कर रहे, चर्चा का अनुसरण |
सुप्तावस्था में पड़े, कुछ पाठक-उपकरण |

कुछ पाठक-उपकरण, आइये चर्चा पढ़िए |
खाली पड़ा स्थान, टिप्पणी अपनी करिए |

रविकर सच्चे दोस्त, काम आते हैं गाढे |
आऊँ हर हफ्ते, पड़े दिन साती-साढ़े ||

http://charchamanch.blogspot.com

मलकीत सिंह जीत said...

आदरनीय मनीष जोशी; जी ,आपकी सभी रचनाये बेहद अच्छी व् किसी न किसी विषय को उठाती है सौभाग्य से पढने को मिल गयी ,आपने निवेदन है की एक मार्ग दर्शक के रूप में (एक प्रायस "बेटियां बचाने का ")ब्लॉग में जुड़ने का कष्ट करें
http://ekprayasbetiyanbachaneka.blogspot.com/

Suman said...

nice

Ravi kant yadav justiceleague said...

बहुत खूब आप मेरी रचना भी देखे ...........

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

बहुत सुन्दर जज्बात ..आनंद आया प्यारी रचना
भ्रमर ५

इन्हीं हालात से, नाज़ुक बने हैं हाल इस माफिक,
कहीं छोटे से छोटे शब्द, बढ़ कर दिल चुभाए हैं

बुरा ना मानना, उनको लगेगा वक़्त चलने में,
जो पिछले पाँव छालों के, चकत्ते काट लाए हैं.

Suman said...

nice

SPIRIT OF JOURNALISM said...

आपके लेख समाज की भावना की अभिव्यक्ति है. हम आपको आपने National News Portal पर लिखने के लिये आमंत्रित करते हैं.
Email us : editor@spiritofjournalism.com,
Website : www.spiritofjournalism.com

sproutsk said...

uncle ji pranam,,
bahut achhi rachna padhne mili,, sadhuwad,, plz mera blog padhkar comment karen,,
sproutsk.blogspot.com

दीपिका said...

क्या बात है! खूबसूरत..

दीपिका said...

क्या बात है! खूबसूरत..

डॉ.मीनाक्षी स्वामी said...

"बुरा ना मानना, उनको लगेगा वक़्त चलने में,
जो पिछले पाँव छालों के, चकत्ते काट लाए हैं."

बहुत खूबसूरत !

ASHOK BIRLA said...

bahut hi sundar ...aapke blog tak pahuch kar accha mahsus kar raha hun .

Anonymous said...

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Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
abhinav pandey said...

खूबसूरती से लिखी हुई रचना
--सुनहरी यादें--
-------------------

परमजीत सिँह बाली said...

-वाह, बहुत उम्दा!!

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

pahli baar aapnke blog par aana hua...charcha manch ko hardik dhnywad..behtarin ghazal ke liye hardik badhayee aaur apne blog par sadar amantran ke sath....aap ek shayer hain..meri ghazal par bhee apna sujhav dene ka kast karein..mujhe ummid hai ,,,

manohar chamoli manu said...

वाह !!!! बहुत उम्दा!! !

कुमार said...

जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है

बहुत ही उम्दा गजल है...बधाई!!

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

sundar gazal .............

dr.aalok Dayaram said...

अकेले गर जो होते घर, तो ढह जाते बहुत पहले,
ये नेमत है सहन की नींव को, साथी बचाए हैं.

बेहतरीन गजल,बधाई,आभार!

Pandit Lalit Mohan Kagdiyal said...

khuda kare jore kalam kuch aur jyada.
saral kintu naye, shabdon se hriday me utarne wali prastutiyan. sadhuwaad.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह जी बहुत बढ़ि‍या

Chaitalee Meghani said...

good one...

keep it up...

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Mahi S said...

बेहतरीन...